रविवार, 13 अप्रैल 2008

सोने का पिंजरा


ईटीवी में नौकरी करना बड़ा कठिन काम है. बस यूं समझ लीजिए कि आपको जंजीरों से जकड़ कर सोने के पिंजरे में डाल दिया गया है. रामोजी फिल्म सिटी किसी हसीन वादी से कम नहीं है. कई बार इसे एशिया की बेहतरीन फिल्म सिटी का अवार्ड मिल चुका है. सो मैंने इसे सोने का पिंजरा नाम दिया है. जहां आपकी जंजीरें एक निश्चित समय के बाद ही खुलेंगी. ऐसे मौके तो बहुत मिलते हैं कि आप खुद से उन जंजीरों को तोड़ कर बाहर आ जाएं. लेकिन तब आपकी हालत लुटी पिटी सी होती है. जी हां मेरी भी कुछ ऐसी ही है. मेरी ही क्यों ऐसी हिमाकत करने वाले सैकड़ों लोग लुटे पिटे से हैं. इतना कुछ खो जाने के बाद संभलने में काफी समय लगता है. खासकर दिमागी तौर पर आप हमेशा परेशान रहते हैं. मैं कोई पहेली नहीं बुझा रहा. ईटीवी में ट्रेनी से शुरूआत करने वाले मेरी व्यथा समझ गए होंगे. चलिए आपको भी विस्तार से व्यथा की कथा बता ही दूं ....
लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद मेरा सेलेक्शन ईटीवी में हो गया. खुशी हुई कि अब अमर उजाला छो़ड़कर टीवी पत्रकारिता की शुरूआत करुंगा. लेकिन इसके लिए तीन साल का बॉन्ड भरवाया गया. बॉन्ड में साफ साफ लिखा था, एक साल के अंदर अगर आपने नौकरी छोड़ दी तो आपको एक लाख रुपये भरने होंगे. दूसरे साल नौकरी छोड़ने पर 75 हजार रुपये और तीसरे साल नौकरी छोड़ने पर 50 हजार का जुर्माना देना होगा. जब हैदराबाद पहुंचा तो ज्वाइनिंग से पहले सारे ऑरिजनल सर्टिफिकेट जमा करा लिए गए. भारी मन से पांच हजार की नौकरी के लिए सारे ऑरिजनल सर्टिफिकेट जमा करा दिए. काम शुरू कर दिया लेकिन जोर का झटका काफी जोर से लगा. यहां कोई विजुअल एडीटर नहीं था. ट्रेनी से लेकर कॉपी एडिटर तक सभी विजुअल एडीटर थे. एक आदमी एंकर लिखता था वो भी स्ट्रिंगर्स की खबरों में का, के, की और मात्रा की अशुद्धि ठीक कर देने भर से अपनी ड्यूटी पूरी कर लेता था. महज कुछ लोग ऐसे थे जो नए सिरे से एंकर लिखने की जहमत उठाते थे. समझ नहीं पा रहा था कि इस नौकरी का क्या करूं. बॉन्ड इसलिए भरा था कि तीन साल में इलेक्ट्रानिक मीडिया की अच्छी खासी समझ हो जाएगी. लेकिन यहां तो विजुअल एडिटिंग के सिवाय लिखने का काम नाम मात्र का ही था. हालांकि दिन भर मे एक पैकेज लिखने का मौका तो मिल जाता था. लेकिन अफसोस, सीनियरों से दिखाने पर बिनी एक शब्द काटे पैकेज ओके हो जाता था. ऐसा बिल्कुल नहीं था कि मैं बहुत अच्छा लिखता था. ऐसा हर किसी के साथ होता था. यानि आप जो लिखते हैं सभी सही है.
एक साल बाद कॉपी एडिटर का ओहदा मिला. इसे विजुअल एडिटर का नाम दिया जाता तो जस्टीफाइ होता. सबसे बेहतर कॉपी एडिटर वह होता था जो विजुअल में जर्क नहीं भेजता था. कई इफेक्ट के साथ पैकेज बनाता था. कमबख्त समय का मारा मैं भी एक बेहतर कॉपी एडीटर बन गया. कहना जरूरी नहीं कि एक बेहतर विजुअल एडीटर बन गया. डेढ़ साल होते होते समय काटना मुश्किल हो गया. हर किसी का प्रोफेशनल लाइफ बर्बाद हो रहा था क्योंकि कलम की ताकत खत्म हो रही थी. कई तो इसी में खुश थे. और ईटीवी को जर्नलिजम की स्कूल मानने लगे थे. जहां पत्रकारों की उपज होती है. ऐसा शायद ही कोई था जिससे विजुअल एडिटिंग नहीं कराई जाती थी. शायद डेस्क इंचार्ज ऐसा नहीं करते थे. लेकिन ज्यादातर डेस्क इंचार्ज ऐसे थे जो पहले कॉपी एडिटर थे. मतलब साफ है विजुअल एडिटर थे. ईटीवी की एक और खासियत थी. किसी विजुअल में जर्क ऑन एयर हो जाने पर या फिर बाइट में प्री रोल पोस्ट रोल नहीं होने पर कॉपी एडिटर की क्लास लगती थी. ये क्लास कोई और नहीं ईटीवी के सीनियर मैनेजर लेते थे. है न मजे की बात. मैनेजर डेस्क इंचार्ज को कहता था अमुक व्यक्ति ने गलती की है मेरे पास भेजिए.
इन सब चीजों से परेशान हो कई लोग मौका देख नौकरी छोड़ रहे थे. लेकिन सबकी अब तक की जमा पूंजी यानि कि ऑरिजनल सर्टिफिकेट यहीं फंसे रहे. नौकरी छोड़ने पर लीगल नोटिस भेजा जाता था. कई लोगों ने डरकर पैसे दिए और सर्टिफिकेट लेकर चैन की सांस ली. लेकिन अभी भी दर्जनों लोग ऐसे हैं जिनके सर्टिफिकेट सोने के पिंजरे(रामोजी फिल्म सिटी) में बंद है. मैंने भी हिम्मत करके नौकरी छोड़ दी और लाइव इंडिया ज्वाइन कर लिया. लेकिन मुश्किल और भी बढ़ गई है. सारे सर्टिफिकेट वहीं फंसे हैं. रिजाइन देने के बाद लीगल नोटिस भेजा गया कि, आपने बॉन्ड ब्रेक किया है इसिलिए पैसे चुकाएं. बात सिर्फ इतनी नहीं है पीएफ के पैसे भी फंसे हैं. बार बार धमकी भरा पत्र आता है कि आप सेटलमेंट कर लो नहीं तो कोर्ट में घसीटे जाओगे. और लोगों की तरह मैं भी इंतजार में हूं जब कोर्ट में मामला जाएगा तो देखेंगे. लेकिन इस बीच बॉन्ड भरने के दौरान साक्षी बने मेरे एक रिश्तेदार को भी धमकी भरा पत्र मिला कि सारे पैसे उनसे वसूले जाएंगे.

3 टिप्‍पणियां:

sushant jha ने कहा…

दोस््त बहुत हिम््मत के साथ लिखा है..तुमने..वाकई ये सोने का पिंजरा है...लाइव इंडिया आने के िलए बधाई..कहां हो रहते हो आजकल...अपना फोन न देना..मेरा नं है.९३५०७१२४१४..मैंने इंडिया न््यूज ज््वाइन कर लिया....

gunjan ने कहा…

कौशल, तुम्हारा दर्द पढ़ा। इसे मैं बेहतर समझ सकता हूं। क्योकिं मैनें भी वह सोने का पिंजरा तोड़ा है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जरूरतमंदों को काम देने की लिए इस तरह के हथकंडे अपनाए जाते है। खैर यह तो दुनिया का दस्तूर है। ताकतवर हमेशा कमजोर का शोषण करता है। और हमारे देश में कानून भी तो ताकतवर के साथ है। खैर अब दिल्ली में हो तो जल्द तरक्की मिलेगी।

सुबोध ने कहा…

कौशल भाई मेरे ख््याल से थोड़ा पर््सनल हो गया..हम अगर ब््‌लॉग को बेहतरी का रास््ता बनाए तो ज््यादा अच््छा लगेगा...बहुत अच््छा लगा तुम््हारे ब््लॉग पर आकर