शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

अन्ना के साथ साजिश !


अन्ना के साथ साजिश रची गई है, गहरी साजिश। अनशन की अनुमति मिली लेकिन जेपी पार्क में सिर्फ तीन दिनों की अनुमति मिली है। केन्द्र सरकार हर वो काम कर रहे हैं जिससे अन्ना के अनशन को रोका जा सके। अब तीन दिन के लिए जेपी पार्क की अनुमति का क्या मतलब है? इसके बाद वो क्या करेंगे? क्या अब इस देश में शांतिपूर्ण विरोध की भी आजादी नहीं है। हमारे वोट से चुनकर संसद में पहुंचे लोग अचानक इतने शक्तिशाली कैसे हो गए कि उन्हें हमारा डर भी नहीं ? बात किसी पार्टी विशेष की नहीं है। कांग्रेस जाएगी तो बीजेपी आएगी। सब तो एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। हमारे पास विकल्प क्या है? हम जनलोकपाल बिल की मांग कर रहे हैं लेकिन भ्रष्टाचारियों की फौज(नेता) राजी ही नहीं हैं। अब अन्ना को अपनी मांग रखने से भी साजिश के तहत रोक रहे हैं।

मंगलवार, 29 मार्च 2011

चक्रव्यूह में फंस गया देश


रोम जल रहा था, नीरो बंशी बजा रहा था। आज भी हालात ऐसे ही हैं। देश में घोटालों की बाढ़ आ गई है, सरकार काला धन वापस लाने को तैयार नहीं। गरीबी, बेरोजगारी से देश का दम निकल रहा है, लेकिन सरकार क्रिकेट के पीछे पागल है। समझ नहीं आ रहा एक खेल को इतनी तवज्जो क्यों ? बिहार में तो विधानसभा का सत्र आधे समय तक ही चलाने का फैसला लिया गया है ताकि विधायकों, मंत्रियों को मैच देखने में कोई दिक्कत न हो। हमारी मानसिकता को क्या हो गया। मुंबई पुलिस वानखेड़े में खेले जाने वाले फाइनल मुकाबले वाले दिन आम अवकाश घोषित करवाने की गुहार लगा रही है। क्या ये खेल का विकृत रूप नहीं है। प्रधानमंत्री मैच देखेंगे, सोनिया जी मैच देखेंगी, पाकिस्तान को न्योता भेजा गया है। हिंदी चैनलों में क्रिकेट के अलावा कोई खबर ही नहीं है। देश के गरीबों की भूख क्रिकेट से ही मिटेगी ! देश के बीमारों का इलाज क्रिकेट से ही होगा ! क्या पाकिस्तान पर जीत से आतंकियों का खात्मा हो जाएगा! कश्मीर समस्या का समाधान हो जाएगा! सड़क पर चाय की दुकान से लेकर फाइव स्टार होटल तक में क्रिकेट का बुखार चढ़ा है। असली मुद्दों से भटकाने के लिए सरकार भी मैच को खूब प्रमोट कर रही है। आम लोगों का दर्द कोई देखने वाला नहीं है। लोगों के दिमाग को इस कदर तैयार कर दिया गया है कि दर्द से तड़पता मरीज भी दवा के बदले मैच का स्कोर पूछ बैठे। धन्य हैं हम... धन्य है हमार सरकार।

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

न्यूज रूम में छल !


मॉर्निंग शिफ्ट के लोग घर जाने की तैयारी में थे। 4 बजे की बुलेटिन शुरू होने में कुछ मिनट ही बचे थे। तभी Executive Producer राकेश त्रिपाठी और राजेन्द्र प्रसाद मिश्रा जी(आरपीएम) मीटिंग से सीधे न्यूज रूम में आए। उनके साथ बाबा रामदेव भी थे। दोनों मिलकर उन्हें न्यूजरूम से रूबरू करवा रहे थे। एकाएक बाबा रामदेव को देख सभी अचंभित थे। आम तौर पर किसी के आने से पहले उनकी चर्चा होती है लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। राकेश जी न्यूज रूम के लोगों से बाबा रामदेव को मिलवा रहे थे। राकेश जी ने जोश में आवाज लगाई अमर जल्दी आओ.... बाबा रामदेव को देख अमर जी दौड़ पड़े... बाबा के सामने हाथ जोड़े भाव विभोर मुद्रा में खड़े थे.. तभी आरपीएम जी बोल पड़े, बाबा ये अमर आनंद हैं लाइव इंडिया के सबसे होनहार प्रोड्यूसर। अमर जी इतने भाव विभोर थे कि उनके मुंह में शब्द जैसे अटक गए थे... एकाएक उनको ख्याल आया और बोल पड़े राकेश भैया बाबा जी के साथ एक फोटो प्लीज... फिर क्या था फोटो खींचने का सिलसिला शुरू हो गया। असिस्टेंट प्रोड्यूसर शंभू जो आम तौर पर साधु संतों को गरियाते नजर आते हैं, बाबा रामदेव के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। कुछ देर में बाबा रामदेव न्यूज रूम से चले गए लेकिन चर्चा सिर्फ उन्हीं की हो रही थी। अमर जी जिस सीट पर बैठते हैं उसके ठीक पीछे एसी है, लेकिन बाबा रामदेव से मिलने के बाद वो पसीने से तरबतर थे। अमर जी बोले जा रहे थे, राकेश भैया का आभारी हूं उन्होंने बाबा रामदेव के सामने मेरा नाम लेकर पुकारा और मिलवाया। अमर जी इतने आह्लादित थे कि बुलेटिन की चिंता भी नहीं रही। आगे बोले, इसी तरह से मैं एक बार राष्ट्रपति से भी मिला था। मैंने पूछा, बाबा को एकाएक देखकर कैसा लगा। अमर जी बोल पड़े-- एकदम से कन्फूजिया गया, कुछ समझ में नहीं आया। दूसरी तरफ शंभू मुझसे मोबाइल से फोटो भेजने को कह रहा था। साथ ही अपनी सफाई भी दे रहा था कि वो सिर्फ बाबा रामदेव की ही इज्जत करते हैं। शंभू ने कहा कि वो ये फोटो अपने गांव में सबको दिखाएगा। वहीं न्यूज रूम में कुछ लोग बाबा रामदेव से मिलकर खुश हो रहे लोगों को देख मंद मंद मुस्करा रहे थे। ये मुस्कुराहट रहस्यमयी थी। कुछ देर में ये रहस्यमयी मुस्कुराहत ठहाकों में बदल गई। ऐसे लगा जैसे बम फूटा- किसी ने कहा ये तो नकली बाबा रामदेव थे। अमर जी जैसे नींद से जागे, उनके चेहरे का पसीना सूख गया। शंभू बोला धत तेरी के बेकूफ बना दिया। नकली बाबा से मिलने वाले बाकी लोगों का भी कुछ ऐसा ही हाल था।

मौत पर भोज पार्ट-3


हरिद्वार से दिल्ली पहुंचे और दूसरे दिन सुबह सीमांचल एक्सप्रेस से पूर्णियां रवाना हो गए। सारे लोग साथ थे, दो सीट दूसरी बॉगी में थी। दुखी तो हम सारे ही थे, आफत हम सब पर टूटी थी लेकिन पापा तो जैसे टूट ही गए थे। वो दूसरी बॉगी में अकेले ही रहना चाहते थे। काफी मनाने के बाद वो दूसरे पैसेंजर से सीट एक्सचेंज करने को राजी हुए। दूसरे दिन हमलोग गांव पहुंचे वहां पहले से ही समाज के लोग इकट्ठा थे। मेरी 100 साल की दादी पर नजर पड़ते ही पापा फूट-फूट कर रोने लगे। घर की एक एक दीवार में मां बसी थी। हर हवा के झोंके मां की याद दिला रहे थे। हम सब फूट-फूट कर रोने लगे। परिवार समाज के लोग इस घड़ी में अपना कर्तव्य निभाते हुए सांत्वना दे रहे थे। लेकिन दुख उस वक्त हुआ जब किसी ने खाने तक को नहीं पूछा। रात हुई तो समाज के लोग अपने घर चले गए। एक तो मां का गम ऊपर से लंबी दूरी से आने के बाद की थकान। पापा समाज की प्रवृति से वाकिफ से उन्होंने घर पहुंचने से पहले हमें बता दिया था कि घर में चावल-दाल तो है लेकिन सब्जियां बाजार से खरीद लो। उम्मीद मत करना कि रात को कोई खाने को भी पूछेगा। गांव के लोगों में अब उतनी आत्मीयता नहीं रही। घर परिवार के लोग भी अब पहले जैसे नहीं रहे। खाने का मन तो नहीं था लेकिन जिंदा रहने के लिए मन को कठोर करना पड़ा। खुद से खाना बनाया और थोड़ा-थोड़ा खाकर सो गए। दूसरे दिन सुबह से ही सांत्वना देने वालों के आने का सिलसिला जारी रहा। फिर सतलहन से एक दिन पहले गांव के लोगों की मीटिंग हुई। हर मौत के बाद ये बैठक होती थी। इस बैठक में क्रिया- कर्म और भोज भात के बारे में चर्चा का प्रचलन है। बुजुर्गों ने मां की आत्मा की शांति के लिए लंबी लिस्ट बना दी। क्रिया कर्म की लिस्ट देख दिमाग चकरा गया। इसके बाद भोज का खर्चा अलग से। बैठक में ये तय हुआ कि कुल खर्च 2 लाख रुपये के करीब आएगा। महंगाई भी बढ़ गई है। भोज का सिलसिला तो सतलहन से ही शुरू हो गया। हालांकि उस सिर्फ अपने टोले के लोगों को ही खिलाने का प्रचलन है। ब्रह्मण तब तक नहीं खाएंगे जब तक कि हम सब शुद्ध नहीं हो जाते। ब्रह्मण तो हमारे घर की चाय भी नहीं पीते। घर में गरूड़ पुराण का पाठ नियमित रूप से चल रहा था। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि कैसे आप अपने पाप से छुटकारा पा सकते हैं। धरती पर किए पाप की सजा यमराज के दूत देते हैं। हजारों तरह के नर्क होते हैं और हर इंसान के पाप के मुताबिक नर्क का द्वार खुलता है। मृतक आत्मा को ज्यादा कष्ट न हो इसके लिए दान का वर्णन है। गरूड़ पुराण के मुताबिक दान देने लगते तो हमारे परिवार में भुखमरी की नौबत आ जाती है। जमाना कहां से कहां चला गया है लेकिन पंडित गरूड़ पुराण पढ़कर बताते हैं कि अगर आपका पति स्वर्गवासी हो गया है तो आपको सति हो जाना चाहिए। सती होने का तरीका भी बताया गया है। पति की चिता के ऊपर किस तरह बैठना है ये भी बताया गया है। गरूड़ पुराण में लिखा है कि ब्रह्मणों के घर मौत होने पर नखवाल 10वें दिन हो। यानि कि ब्रह्मण जाति के लोग जल्दी शुद्ध होंगे। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इतनी जल्दी शुद्ध नहीं होंगे। जब मैंने अपने पंडित से पूछा कि हमलोग 10 दिन में शुद्ध क्यों नहीं हो सकते तो उनका कहना था कि कलयुग में धर्म की हानी हुई है इसलिए आपलोग भी अब नियम बदलकर 10 दिनों में नखबाल कर सकते हैं। कहीं न कहीं कहने का मतलब ये था कि हम लोग अधर्मी हो गए हैं इसलिए 10 में करने की बात कर रहे हैं। हम तीनों भाई भोज-भात के पक्ष में नहीं थे। एक तो मां की मौत ऊपर से 2 लाख रुपये का खर्च। पंडितों ने इतना डरा दिया है कि अभी भी लोग इस परंपरा से हटने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। जब पापा से बात की तो वो रोने लगे बोले कि मां की आत्मा को शांति कैसे मिलेगी। समाज के कुछ लोगों ने तो हर कर दी जो दो दिन पहले मौत पर सांत्वना दे रहे थे वही अब बेहतर हलवाई मंगाने की बात कर रहे थे। एक सज्जन जो रिश्ते में मेरे चाचा लगते हैं पापा को कह रहे थे कि इलाके में इज्जत का सवाल है पांच-छह तरह की मिठाई तो जरूर रखना। मेरी एक न चली। मामा मुझे समझा रहे थे, कुछ मत बोलो नहीं तो पापा को कष्ट होगा। मैंने बैठकी में भी भोज-भात का विरोध किया लेकिन कोई फायदा नहीं...। दिल मसोस कर सारी तैयारी में शामिल होता रहा। सतलहन के बाद नखबाल के दिन भी भोज हुआ। एकादशा और द्वादशा के भोज के लिए हलवाई 10 हजार के मेहनताना पर माना। क्रिया-कर्म और भोज में करीब 2 लाख रुपये खर्च हो गए। बावजूद इसके कुछ लोगों को सब्जी में नमक ज्यादा और कम होने की शिकायत होती रही। हद तो तब हो गई जब लोगों को खाना खिलाने वाले गांव के युवकों की टोली ने दारू की मांग की। बेहयाई भरी मांग को भी पूरी करनी पड़ी। इस मांग में मेरे परिवार के लोग भी शामिल थे। बातें बहुत हैं और क्या क्या लिखूं।