मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

पार्ट-2, धर्म से दिल घायल होता रहा

अस्पताल के चक्कर काटते काटते डॉक्टरों से नफरत होने लगी। लेकिन मां की मौत के बाद सबसे ज्यादा नफरत हिंदू धर्म और इस धर्म को बचाए रखने वाले पाखंडियों से होने लगी। 15 अक्टूबर को सुबह करीब 7 बजे मां को लेकर हम लोग हरिद्वार के कनखल श्मशान घाट पहुंचे। लकड़ी कफन का प्रबंध किया। फिर घाट पर पंडित की लीला शुरू हुई। उन दो पंडित और चिता जलाने वाले का चेहरा अब भी याद है। मां को मुखाग्नि देने से पहले गंगाजल हाथ में लिए हम तीनों भाई पंडित के सामने बैठे थे। वो हमारे मुंह से दक्षिणा की राशि कहलवाना चाहता था। हमने कहा जो भी बन पड़ेगा दे देंगे। पंडितों का चेहरा लाल होने लगा। वो जिद कर रहा था कि जो भी दोगे उसे हाथ में गंगाजल लेकर अपने शब्दों से बयां करो। हम तीनों भाई और पापा हतप्रभ थे। मां की असमय मौत से टूटे हुए इन यमराजों के फेर में फंसे थे। हमने पूछा दक्षिणा कितना बनता है? उसका जवाब था तीन स्तर के दक्षिणा का प्रचलन है-
पहला (उत्कृष्ट) मतलब एक लाख या उससे ऊपर,
दूसरा (मध्यम) 50 हजार या उससे ऊपर,
तीसरा (निकृष्ट) 11 हजार रूपये
हमने सोचा भी नहीं था कि मां को जलाने के लिए सौदेबाजी करनी पड़ेगी। मां की इच्छा थी कि वो हरिद्वार आकर कुछ दिन रहे। जिंदा रहते वो आ न सकी इसलिए पापा हरिद्वार में ही दाह संस्कार करना चाहते थे। लेकिन यहां धर्म के सौदागरों का चेहरा देख मन खिन्न हो गया। वो बार बार हमें निकृष्ट होने का अहसास दिलाते रहे। मैंने दोनों पंडितों की बात नहीं मानी। उनसे थोड़ी बहुत बहस भी हो गई। आखिरकार बड़े भैया ने मां को मुखाग्नि दी। दोनों पंडित ये कहकर दूसरे शव के पास चले गए कि 4 घंटे में शव जलने के बाद वो दक्षिणा लेंगे। इशारों ही इशारों में वो ये भी समझा गए कि चिता सजाने वाले, चिता जलाने वाले और वहां मौजूद एक दो और लोगों को भी कुछ न कुछ देना पड़ेगा। हम सब इसी चिंतन में थे कि पता नहीं ये कितने पैसों में मानेगा। लेकिन मैंने भी ठान लिया था कि जब सौदेबाजी ही कर रहा है तो ढंग से करेंगे। पापा ने कहा कि 5 हजार रुपये दे देना लेकिन मैंने बात नहीं मानी। चिता जलने के ठीक बाद फुलिया को गंगा में प्रवाहित करने की बारी आई। हम सब फुलिया को गंगा में प्रवाहित करने लगे। उसी दौरान श्मशान घाट का एक आदमी बोल पड़ा ठहरो सिर वाले हिस्से का राख बचाकर रखना। जब आगे के हिस्से को प्रवाहित करने की बारी आई तो चिता जलाने वाले डोम महाराज फुलिया को गंगा की सीढ़ियों पर रखने को कहने लगे। हम कुछ समझ नहीं पा रहे थे। उसके कहे मुताबिक बाकी बचे फुलिया को सीढ़ियों पर डालने लगे। ये क्या वो तो राख पर पानी डालकर कुछ ढूंढ रहा था। सीढ़ियां उबर खाबर थी इसलिए हल्की राख गंगा में बह जा रही थी लेकिन कुछ सिक्के दिख रहे थे। वो उन सिक्कों को उठाकर अपनी जेब में रख रहा था। वो पागलों की तरह कुछ और ढूंढ रहा था। ठीक उसी वक्त एक पंडित भी पहुंच गया दोनों की गिद्ध नजरें किसी खास चीज को ढूंढने में लगी थी। तब समझ में आया कि मुखाग्नि से पहले मां के मुंह में सोने का टुकड़ा डाला था ये उसे ही ढूंढ रहे हैं। मां नाक में भी सोना पहने हुये थी शायद मुखाग्नि के दौरान इनकी नजर उस पर भी पड़ गई थी। मन व्यथित हो गया। इन लालचियों को देखकर घिन आने लगी। एक ने पूछा कुछ मिला तो दूसरा कमेंट करने से भी बाज नहीं आया बोला, पता नहीं सोना डाला भी था या नहीं। वो भली भांति जानता था कि मुंह में सोना डाला गया है फिर भी तंज कस रहा था। आखिरकार एक ‘गिद्ध’ को सफलता मिल गई। मैंने ध्यान से नहीं देखा लेकिन उसने दो छोटे टुकड़ों को अपनी जेब में डाला। उसके चेहरे का भाव देखकर समझ में आ रहा था कि शायद ये अपने मंसूबे में कामयाब हो गया है। अब बारी थी दक्षिणा की। दक्षिणा लेने के लिए छह लोग जमा हो गये। दोनों पंडित पहले बाकी लोगों को दक्षिणा दिलवाना चाहते थे। खैर हमने सौ डेढ़ सौ के हिसाब से बाकियों को निपटा दिया लेकिन पंडितों का विकराल मुंह फिर खुल गया। दोनों ने फिर तीन स्तर के दक्षिणा की याद दिलाई। फिर ये अहसास कराने लगे कि कम पैसे दोगे तो दाह संस्कार निकृष्ट माना जाएगा। मैंने सीधा जवाब दिया 500 रुपये दूंगा। पंडितों का मुंह बिचक गया वो खाने वाली नजरों से मुझे देखने लगे। मेरे चेहरे पर भी आक्रोश था। शायद दोनों पंडितों को लगा कि ये ज्यादा देने वाला नहीं है। जो अब तक 11 हजार से कम लेने को तैयार नहीं था एकाएक बोल पड़ा 500 में हम नहीं मानेंगे कम से कम 11 सौ रुपये तो दे दो। हमने भी चट 11 सौ रुपये निकालकर दे दिया। हमें लग रहा था जैसे मुक्ति मिली। लेकिन धर्म का आडंबर यहीं खत्म नहीं हो रहा है। अभी तो क्रिया कर्म बाकी था... आगे का अनुभव भी कम कड़वा नहीं रहा। जारी है ... धर्म से दिल घायल होता रहा।

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

काहे का धर्म, काहे का भगवान ? पार्ट-1

मैं किसी धर्म को क्यों मानता हूं। मैं हिंदू क्यों कहलाता हूं। जबसे होश हुआ है कभी शपथ पत्र पर हस्ताक्षर तो नहीं किया कि मैं हिंदू हूं और जीवनभर हिंदू रहूंगा। हिंदू ही क्यों मुसलमान, सिख या फिर किसी और धर्म के होने का भी तो प्रमाणपत्र नहीं है मेरे पास। हां मैं हिंदू कहलाता हूं। सिर्फ इसलिए कि मैं एक राजपूत घर में पैदा हुआ जो कि हिंदू धर्म की एक जाति है। बचपन से घरवालों ने जैसा कहा, वैसा किया। भगवान और अल्लाह में भेद करना सिखाया। अपने- पराये में भेद करना सिखाया। जो सिखाया प्यार से सीखता गया। छिपकली को हिंदू और मकरे को मुसलमान समझने लगा। छिपकली को बचाकर और मकरे को मारकर गर्व होता था। लगता था चलो आज मुसलमानों को कुछ तो नुकसान पहुंचाया। मानसिकता बनी मुसलमान गंदे होते हैं। हालांकि मेरे घर दादा के एक दोस्त आते थे अब भी आते हैं जो मुसलमान हैं। दादा उन्हें अपने भाई के समान मानते थे। हमलोगों को सिखाया गया था कि उनके पैर छुने हैं। हम छुते भी थे लेकिन उस वक्त कोई नफरत नहीं होती थी। मन में एक सवाल जरूर कौंधता था जब मुसलमान गंदे होते हैं तो मतुल दादा गंदे क्यों नहीं हैं। लेकिन वो जिस तरीके से घर में सबसे मिलते थे और सब उनकी इज्जत करते थे उससे मन में कन्फ्यूजन पैदा होता था। आखिर सच क्या है। किसका धर्म अच्छा है। खैर भेदभाव यहां भी था, मतुल दादा के अलग कप में चाय भेजी जाती थी। पता नहीं उनको इस बात का अहसास था भी या नहीं। लेकिन मेरे दादाजी इस बात के खिलाफ थे इतना जरूर पता था। वो टीचर से रिटायर्ड होकर घर पर बैठे थे। उनके मन में भेदभाव की लकीर कभी नहीं देखी थी। खैर मैं जरा दूसरी तरफ भटक गया। असली मुद्दा हिंदू होने का है। पूजा पाठ में भी मन लगा। मेरा जन्म नवरात्र के दिन यानि पहली पूजा को हुआ था। घरवाले मुझे लकी मानते थे। भगवान में मेरा भी खूब भरोसा था। जब तक घर पर रहा बिना कुछ सोचे समझे पूजा पाठ में खूब मन रमाया। मेरे यहां हर महीने सत्यनारायण भगवान की कथा का प्रचलन आज भी है। नवरात्र में नौ दिन तक पूजा होती है। घर में कलश स्थापित होता है। इस बार मां दिल्ली के अस्पताल में भर्ती थी इसलिए घर पर पूजा नहीं हो सकी। सबने यही सोचा था मां ठीक हो जाए तो अगले साल धूमधाम से पूजा करेंगे। नवरात्र के दौरान सप्तमी को दिल्ली के एम्स में मां की सांसें थम गई। मौत से सिर्फ दो घंटा पहले पता चला था कि मां को ब्रेन ट्यूमर है। इससे पहले फेफड़े की बीमारी ब्रॉन्काइटिस से पीड़ित थी और किडनी से प्रोटीन लीक हो रहा था, जिसे डॉक्टर FSGS का नाम दे रहे थे। डॉक्टर्स का कहना था कि 5 साल तक कुछ नहीं होगा लेकिन मेरी मां नहीं रही। नवरात्र में पैदा होने के कारण मैं खुद को भाग्यशाली मानता था अब नवरात्र में ही मैं सबसे दुर्भाग्यशाली बन गया। मां के बिना दुनिया उजड़ गई। पहली बार मन में सवाल उठने लगे कि भगवान होते भी हैं या नहीं। लेकिन मां की मौत के बाद जिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा उससे भगवान और हिंदू धर्म दोनों से नफरत होने लगी। आखिर ऐसा क्यों हुआ फिर कभी बताऊंगा। .... जारी है... जिंदगी के दुखद अनुभव जिससे दुनिया और धर्म को कुछ हद तक समझ पाया।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

गंदे पत्रकार, गंदी पत्रकारिता

इस हमाम में सब नंगे हैं। पत्रकारों की जमात में नंगों की कमी नहीं है। जब भारत गुलाम था, पत्रकार सच्चे थे। वो भारत को आजादी दिलाने के लिए लिखते थे। आजादी मिल गई तो पत्रकारों का चरित्र बदलने लगा। छोटे से बड़े सभी पत्रकार कमाने के फेर में लग गए। पत्रकारिता एक व्यवसाय के रूप में उभरने लगा तो गंदगी बढ़ने लगी। स्ट्रिंगर से लेकर रिपोर्टर और संपादक तक नंगे होने लगे। हालांकि कुछ पत्रकार अब भी इमानदार बने रहे लेकिन इनकी संख्या न के बराबर ही रही। पत्रकारों को बेईमान बनने के पीछे कई कारण रहे हैं। स्ट्रिंगर और छोटे रिपोर्टर इसलिए दलाल बन गए हैं कि क्योंकि उनकी सैलरी बहुत ही कम होती है। इसमें मीडिया संस्थानों की महती भूमिका होती है। सभी टीवी चैनल या अखबार मालिकों को पता है कि स्ट्रिंगर के परिवार का पेट महज 2 हजार या 3 हजार रूपये महीना की सैलरी में भरने वाला नहीं है। स्ट्रिंगर तो गांव और ब्लॉक स्तर पर जमकर दलाली करते हैं। वहां इनका बड़ा रूतवा होता है। स्ट्रिंगर पत्रकारिता से ज्यादा दलाली और पंचायत करने में अपना बड़प्पन समझते हैं। थानों में दरोगाजी के सामने ऐसे पत्रकारों की बड़ी इज्जत होती है। इतना ही नहीं मीडिया संस्थान इन स्ट्रिंगरों से ही अपना विज्ञापन भी मंगवाते हैं। विज्ञापन के खेल में भी इन स्ट्रिंगरों की कमाई हो जाती है। ये तो रही स्ट्रिंगरों की बात। पत्रकारों की ये बीमारी श्रृखलाबद्ध तरीके से ऊपर तक फैली है। स्ट्रिंगर सौ दो सौ या कुछ हजार लेकर खुश रहते हैं लेकिन जैसे जैसे इससे ऊपर बढ़ेंगे दलाली का रेट भी बढ़ता जाता है। जिला स्तर के स्ट्रिंगर गांव वाले स्ट्रिंगर से ज्यादा कमाते हैं। कुछ तो शहर में ही अपना केबल टीवी चैनल खोल लेते हैं। जिला स्तर के भ्रष्ट अधिकारियों से मिलकर खूब कमाई करते हैं। ये राज्य स्तर के पत्रकारों में बीमारी का स्तर अलग होता है जाहिर है ये प्रदेश की राजधानी में डेरा जमाए रहते हैं जहां विधायक और मंत्रियों की चलती है। बात जब दिल्ली तक पहुंचती है तो पत्रकारों की दलाली अपने चरम पर पहुंच जाती है। अब तक आदर्श पत्रकारों के तौर पर मशहूर वीर सांघवी, बरखा दत्त की भी पोल खुल गई है। अब वो चाहे कितनी भी सफाई दे दें लोगों के दिलोदिमाग में सच घर कर चुका है। भले ही इन दल्ला पत्रकारों पर संस्थान कोई कार्रवाई न करें, इन्हें कोर्ट के भी चक्कर न लगाना पड़े लेकिन सच तो सच है। दुनिया जान चुकी है कि बरखा दत्त, प्रभु चावला, वीर सांघवी जैसे नामी पत्रकार जो इमानदारी और भष्ट्राचार को खत्म करने की बड़ी बड़ी बातें करते हैं दरअसल वो बकवास से ज्यादा कुछ नहीं है।