सोमवार, 15 दिसंबर 2008

क्या बदलेगी तस्वीर ?


ये कलयुग है, घोर कलयुग... जो चल रहा बुराई की राह है उसका सितारा बुलंद है। जिसने पकड़ी सच्चाई और सादगी की राह उसके सितारे गर्दिश में हैं। जो बाचाल है, बदचलन है, बदतमीज है, जिसने छोटे बड़े का लिहाज नहीं किया वो चमकता है, दमकता है। ज्यादातर लोग भी उसके पीछे ही रहते हैं। हां में हां मिलाकर इस दबंग प्रजाति का पोषण करते हैं। जी हां मैं बात कर रहा हूं बिहार का जहां ये हालात आज भी हैं। समाज में उनकी हंसी उड़ती है जो पढ़े लिखे हैं और घर से बाहर नौकरी करते हैं, बड़े छोटों का लिहाज करते हैं, उटपटांग बोलने से परहेज करते हैं। पर्व त्योहार या शादी ब्याह के समारोह में अचानक सबकुछ बदल जाता है, जब कोई दबंग पहुंच जाता है। वे लोगों के आकर्षण का केन्द्र होता है। सब इज्जत करते हैं। अगर उसने दो चार मर्डर किये हों तो कहने ही क्या। एक मर्डरर अकड़ता है, उसके आगे पीछे आठ दस बेरोजगार छोरे चमचे की तरह खातिरदारी कर अपने को धन्य समझता है। भई खातिरदारी इनकी नहीं होगी तो क्या आपकी होगी। यहां रहने वाले लोगों का काम तो यही करते हैं। चाहे इंदिरा आवास हो या लाल कार्ड बनवाने की जल्दी। मर्डरर को खोजा जाता है। वही तो ब्लाक में अधिकारियों को धमकाता है। लाल कार्ड बनवाता है इंदिरा आवास दिलवाता है। ये और बात है कि इंदिरा आवास के ज्यादा पैसे तो यही खा जाते हैं। छोटी मोटी लड़ाई थाने पहुंच जाय तो यही जनाब थानेदार को दो चार हजार दिलवाकर मामला निपटाते हैं। ये तो अंदर की बात है कि उस दो चार हजार में इनकी भी हिस्सेदारी होती है। ऐसे में बताइये तो सही पूछ किसकी होगी ? लोग किसके पीछे भागेंगे ? किसकी खातिरदारी होगी? क्या आपके पास है जवाब कि कब बदलेगी तस्वीर?

रविवार, 14 दिसंबर 2008

जॉर्ज बुश पर जूतों की बरसात

(तस्वीर- सौ. बीबीसी हिन्दी)
अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को उनका आखिरी इराक दौरा ताउम्र याद रहेगा। दुनिया के सबसे ताकतवर इनसान को सपने में भी गुमान न होगा कि कोई उस पर जूतों की बरसात कर देगा। 14 दिसंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश अचानक इराक पहुंच गये। इस दौरान राष्ट्रपति ने उनका भरपूर स्वागत किया। दोनों देशों के बीच सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षार भी हुए। लेकिन इस दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसे जॉर्ज बुश जिंदगी भर नहीं भूला पाएंगे। जॉर्ज बुश इराकी प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकि के निजी ऑफिस में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। तभी अल बगदादिया न्यूज चैनल के पत्रकार मुंतजेर अल जैदी ने गालियों के साथ बुश पर जूते फेंके। हालांकि वे जूते बुश को नहीं लगे। फुर्तीले बुश ने बमुश्किल अपने आप को बचाया। जूते उनके सिर के उपर से निकल गये। ये वाकया कई सवाल खड़े करता है? क्या इराक के लोग अमेरिकी मदद से आजिज आ गये हैं? क्या अब उन्हें अमेरिकी फौजों की जरूरत नहीं है? क्या अमेरिका को अपनी फौज जल्द वापस बुला लेनी चाहिए ? जूते खाते खाते बचे बुश साहब जरा इन सवालों पर गौर फरमाइये।

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

जान बचाने की खातिर... बाढ़ में लड़ाई....


बिहार में प्रलय की स्थिति है। पूर्णियां जिले में भी बाढ़ ने विकराल रूप धर लिया है। मेरे गांव में अभी तक बाढ़ नहीं आई है लेकिन पड़ोस के गांव पानी में डूब रहे हैं। रात पापा से फोन पर बात हुई। मेरे गांव में भी लोग बाढ़ से बचने की तैयारी में जुटे हैं। एक बात जो पापा ने बताई दिल दहला गया। बच्चों की लाशें पानी में यू ही बह रही हैं। लोग उसे निकालकर जहां तहां दफना रहे हैं। गांव में आबादी वाली जगहों को छोड़ खेतों में पानी भरा है और लगातार स्तर बढ़ता ही जा रहा है। बाढ़ की इस विकराल स्थिति के बीच जान बचाने के लिए लोग आपस में लड़ने मरने को तैयार बैठे हैं। मेरे गांव के पास ही एक बांध ही जिसका जलस्तर लगातार बढ़ता जा रहा है। दूसरी तरफ के लोग पानी में डूबे हुए हैं। मेरे गांव की तरफ के लोग बांध को और भी ऊंचा करने में लगे हैं। इस काम में एक दो नहीं बल्कि एक हजार के करीब लोग अंजाम दे रहे हैं। उनके हाथों में फावड़ा लाठी डंडा है। वहीं दूसरी तरफ के लोग जोकि पानि से बेहाल हैं बांध को तोड़ने पर आमाद हैं आप महज अंदाजा भर लगा सकते हैं कि वहां किस तरह की स्थिति होगी। एक तरफ के लोग तोड़ने के लिए मौके की तलाश में है तो दूसरी तरफ के लोग रात रात भर जागकर बांध की पहरेदारी कर रहे हैं। दोनों तरफ से मार काट जैसी स्थिति बनी हुई है। लोगों की संख्यां दोनों तरफ से बढ़ती ही जा रही है। इस बीच कुछ बुजुर्गों ने दोनों तरफ सहमति बनाने की सोची और बाढ़ में परेशान लोगों को अपनी तरफ आ जाने की पेशकश की है। लेकिन हजारों की संख्यां में फंसे लोगों को ला पाना आसान काम भी तो नहीं। अब दो स्थिति बन रही है एक तो कभी भी मार काट मच सकती है। दूसरी अगर प्रकृति ने खुद ही चाहा तो बांध टूट सकता है। और फिर इस तरफ के लोग भी बाढ़ में बहेंगे। लोग न चाहकर भी एक दूसरे की जान के दुश्मन बने बैठे हैं। वहीं प्रशासन को अभी तक इस स्थिति की जानकारी नहीं है। अगर है भी तो वे कुछ भी करने से मजबूर हैं। अब इस प्रलय से लोगों को भगवान ही बचाए।

बुधवार, 16 जुलाई 2008

गुंडों वाले आसाराम बापू ?


फंस गए बेचारे धर्म गुरू आसाराम बापू। आखिर ऐसा क्या हुआ कि हजारों लोग अहमदाबाद की सड़कों पर उतर गए और आसाराम बापू हाय हाय के नारे लगाने लगे ? उनके बैनर और पोस्टरों को फाड़ दिया गया। अहमदाबाद में उनके आश्रम के बाहर हंगामा किया गया। आखिर क्यों लाखों लोगों की श्रद्धा के पात्र रहे आसाराम बापू से इतने लोग नफरत करने लगे ?
मामला इतना छोटा भी नहीं है। शांत और समृद्ध जिंदगी जीने की कला बताने वाले गुरू के आश्रम के दो बच्चों की मौत हो गई। दो परिवारों के घर का चिराग बुझ गया, लेकिन बाबा ने इसकी जिम्मेदारी लेने से साफ मना कर दिया। बच्चों के घरवालों ने आरोप लगाए कि आश्रम की लापरवाही से ही दोनों बच्चों की हत्या की गई। लेकिन आश्रम ने ये तर्क दिया था कि दोनों बच्चे रथ यात्रा देखने के लिए आश्रम से फरार हो गए थे। दिन दिन बाद दोनों बच्चों की लाश आश्रम के पीछे नदी किनारे मिली। पहली नजर में तो आश्रम की लापरवाही साफ दिखती है। बच्चों के घरवालों को सांत्वना देने के बदले उल्टे आसाराम बापू अपनी दामन बचाने में लग गए। एक सभा में उन्होंने दोहे पढ़े कि उन्हें फंसाया जा रहा है। उनके उपर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं। आखिर आसाराम बापू को ऐसी सफाई देने की जरूरत ही क्यों पड़ी। जब दो घर का चिराग बुझ चुका है तो क्या वे अपने लिए न्याय की मांग भी न करें। हद तो तब हो गई जब आसाराम बापू के गुंडों ने एक अखबार के दफ्तर में जमकर तोड़फोड़ की। इस अखबार ने बाबा के खिलाफ लिखने की जुर्रत की थी। आखिर ये कैसे बाबा हैं जो अपने खिलाफ एक आवाज नहीं सुन सकते। आखिर क्यों राजनेताओं की तरह इन्होंने अखबार के दफ्तर पर हमले करवाए। अगर हमले आसाराम बापू ने नहीं करवाए तो इन्होंने हमले की निंदा क्यों नहीं की। बुधवार 16 जुलाई को अहमदाबाद में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। लोग सड़कों पर उतर आए और आसाराम बापू के खिलाफ नारेबाजी की और उनके पोस्टर फाड़े। पूरी घटनाक्रम को देखें तो लोगों का गुस्सा जायज है। अब तो एक संत सभा ने भी पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग कर दी है। अब एक सवाल कि क्या लोगों को शांति का पाठ पढ़ाने वाले बाबा का असली चेहरा कुछ और है ?

रविवार, 8 जून 2008

क्या है माजरा?

राजस्थान में गुर्जरों अब तक अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल हैं। ऐसे में उन्हें इस वर्ग के हिसाब से आरक्षण भी मिल रहा है। लेकिन गुर्जरों की मांग है कि उन्हें अनुसूचित जनजाति में श्रेणी में डाल दिया जाए। गुर्जर अनुसूचित जनजाति में शामिल होते ही मजबूत स्थिति में आ जाएगा। ऐसा प्रावधान है कि अनुसूचित जनजाति के लोगों की जमीन उसी की जनजाति के लोग खरीद सकते हैं। ऐसे में गुर्जर अपनी जमीनी ताकत को आसानी से बढ़ा सकते हैं। साथ ही अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग नियम भी हैं। इन्हें सामान्य झगड़ों को खुद ही सुलझाने के अधिकार मिल जाएंगे। और भी कई फायदे हैं जिसके लिए गुर्जर इस श्रेणी में आने को बेताब हैं।
(स्रोत- बीबीसी और अन्य साइट्स)

गुर्जर बनाम वसुंधरा


दो कदम गुर्जर चले तो दो कदम राजस्थान सरकार चली। लेकिन ये क्या ये कदम निश्छल और नापाक हैं? खैर इन सवालों के जवाब आने में अभी वक्त लगेंगे, इंतजार कीजिए। सोमवार यानि 9 जून को दो पक्ष आपस में मिलेंगे। दोनों पक्ष एक दूसरे को शंकित नजरों से देखता रहा है, इसमें भी कोई दो राय नहीं। जहां गुर्जरों का कहना है कि वोट पाने के लिए बीजेपी ने उनसे वायदा किया था और वोट मिलने के बाद वायदे से मुकर गई। वहीं राजस्थान सरकार के अपने तर्क हैं। सरकार ने चोपड़ा समिति बनाकर मुद्दे को टालने की कोशिश की थी। लेकिन गुर्जर अड़ गए तो वसुंधरा राजे ने केंन्द्र को चिट्ठी लिखकर गुर्जरों को डिनोटिफाइड श्रेणी यानि घूमंतू जाति के तहत तीन से चार फीसदी आरक्षण देने की मांग की। लेकिन केन्द्र ने भी गेंद फिर से वसुंधरा के पाले में डाल दिया। केन्द्र सरकार का कहना था कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से अलग श्रेणी में आरक्षण का प्रावधान करने का अधिकार राज्यों को है, और राज्य खुद ही ऐसा कर सकता है। केन्द्र के पलटवार के बाद वसुंधरा सरकार के माथे पर बल पड़ गए। गुर्जरों को शांत करने के लिए वार्ता का प्रस्ताव रखा, लेकिन गुर्जर आरक्षण की मांग पर अड़े हैं। ऐसे में सोमवार की बैठक में शायद ही कोई बीच का रास्ता निकल पाए। गुर्जर नेता उन जिंदगियों का हिसाब मांगेंगे जो आरक्षण की मांग के दौरान पुलिस की गोलियों का शिकार बने। अगर गुर्जर नेता झुक गए तो आम गुर्जरों की भावना आहत होगी। उन्हें लगेगा कि नेता राजनीति कर रहे हैं। वहीं सरकार गुर्जरों को अनुसूचित श्रेणी में डालकर मीणाओं को नाराज करने से परहेज करेगी। लेकिन चुनाव को देखते हुए गुर्जरों को नाराज करना भी सरकार के बूते की बात नहीं।

गुरुवार, 5 जून 2008

नहीं रही सुबाना

सुबाना पर कविता लिखने के काफी दिनों तक मैं सोचता रहा कि आखिर उस बच्ची का क्या हुआ। कहीं से कोई खबर नहीं मिल रही थी। आखिरकार जयपुर में मैंने एक दोस्त को फोन किया तो जो खबरें आई वो विचलित करने वाली थी। जयपुर विस्फोट के महज चार दिन बाद ही सुबाना भी अपनी मां के पास चली गई। जयपुर विस्फोट में सुबाना की मौसी और मां की मौत हो गई थी। सुबाना को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन काल पर किसी का वश नहीं होता। वो मासूम बच्ची जिंदगी की जंग हार गई। अब नहीं रही सुबाना। शर्म करो दहशतगर्दों, फूल सी बच्ची ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो उसकी निश्छल जिंदगी बर्बाद कर दी। पहले तो बच्ची से उसकी ममता का आंचल छीन लिया और उसे इतना गहरा जख्म दिया कि वो भी नहीं रही। शर्म करो आतंकवाद........

बुधवार, 14 मई 2008

मां तुम कहां हो ?








(तस्वीर सौजन्य- बीबीसी हिंदी बेवसाइट)


मैं मुंबई में लहती थी
नाना नानी की याद बहुत सताती थी
मामा मामी भी याद बहुत आते थे
उनाका दुलाल उनका प्यार सब मिस कलती थी
लेकिन क्या कलूं ... पढ़ाई जो कलनी थी ...
कुछ बनना था... नाना को दिखाना था...
सो मुंबई में ही लहना था
गर्मी की छुट्टियों में पढ़ाई से थोली राहत मिली
नाना नानी की फिल याद आई
मौसा- मौसी से भी मिलना था
पापा से विनती की चलो ननिहाल
लेकिन, पापा तो बस काम में लगे लहे...
मम्मी को भी अपनी मम्मी से मिलना था
सो हम दोनों चल दिए ननिहाल... मेला ननिहाल
छुक छुक कलती ट्रेन पहुंच गई जयपुर
स्टेशन पर नाना की पकी दाढ़ी को खींचा
मामा को चपत लगाई...
घर में खूब धूम मचाया...
नानी से सुनी कहानी...
आज खुश थी...
दोनों मौसियां और मां तैयार थी
निकल पली बाजाल
वहां खलीदा खूब खिलौने और खलीदे कपड़े
नाना के लिए धोती ली और नानी के लिए साड़ी
जयपुर का ये बाजाल मुंबई से कितना अलग था
मां से की जिद जल्दी चलो नाना को धोती देनी है
उनकी पकी मूंछे भी लंगनी है
मौसी ने लिक्शा लिया....

और फिर ???????? कुछ याद नहीं...
आंखें खुली तो... तो पास में नर्स थी..
मां तुम कहां हो आओ न... मौसी तुम भी आओ न
नाना को धोती पहनानी है.... उनकी पकी मूंछें भी लंगनी है


(सुबीना मुंबई से नाना नानी के घर जयपुर आई थी... शहर में मम्मी और मौसियों के साथ खरीदारी
करने निकली थी। पर मंगलवार की शाम आतंक का जो तांडव जयपुर में हुआ उसके बाद सुबाना की दुनिया बदल गई. माँ का आंचल छिन गया, मौसियां सदा के लिए सो गईं. )

तीन साल के धमाके

  • 29 अक्तूबर 2005 - दिल्ली में तीन जग़हों पर हुए बम धमाकों में 62 लोग मारे गए।
  • 7 मार्च 2006 - उत्तर प्रदेश के वाराणसी में रेलवे स्टेशन और संकटमोचन मंदिर में बम धमाकों में 20 लोग मारे गए।
  • 11 जुलाई 2006 - मुंबई की लाइफ लाइन मानी जाने वाली लोकल ट्रेनों में हुए बम धमकों में 170 लोग मारे गए।
  • 8 सितंबर 2006 - महाराष्ट्र के नासिक ज़िले के मालेगाँव में एक मस्जिद के पास हुए तीन बम फटे। 37 लोगों की मौत।
  • 18 फ़रवरी 2007 - दिल्ली से अटारी जा रही समझौता एक्सप्रेस में हुए दो धमाकों में 66 लोग जलकर मारे गए जिसमें से अधिकतर पाकिस्तानी थे.
  • 18 मई 2007 - हैदराबाद की मक्का मस्जिद में नमाज़ के दौरान हुए धमाके में 11 लोग मारे गए।
  • 25 अगस्त 2007 - हैदराबाद में हुए बम विस्फोट में 42 लोग मारे गए।
  • 11 अक्तूबर 2007 - राजस्थान में अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में हुए धमाके में दो लोग मारे गए।
  • 23 नवंबर 2007 - उत्तर प्रदेश में लखनऊ, फ़ैज़ाबाद और वाराणसी की कचहरियों में हुए बम धमाकों में 13 लोग मारे गए और 75 घायल हुए।
  • 1 जनवरी 2008 - उत्तर प्रदेश के रामपुर में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के शिविर पर हुए चरमपंथी हमले में सात सुरक्षाकर्मियों समेत आठ लोग मारे गए।
  • 13 मई 2008 – राजस्थान के जयपुर में छह जगहों पर आठ बम धमाके हुए। जिसमें 70 लोगों की मौत हो गई। जबकि 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए।

शनिवार, 3 मई 2008

सरबजीत की फाँसी पर रोक

हर पल मर रहे सरबजीत के परिवार को थोड़ी राहत मिली है। पाकिस्तान की सरकार ने 2 मई को सरबजीत की फांसी पर अगले आदेश तक के लिए रोक लगा दी है। पिछले दिनों सरबजीत की पत्नी उनकी दो बेटियां, बहन और बहनोई पाकिस्तान गए थे। इस दौरान पाकिस्तान सरकार ने इन लोगों की सरबजीत से मुलाकात भी करवाई थी।

मंगलवार, 29 अप्रैल 2008

वो 48 मिनट


सरबजीत का परिवार एक हफ्ते बाद वाघा सीमा से भारत वापस आ गया। कुछ खुशी के तो कुछ गम के आंसू लिए ये वतन लौटे। इनके साथ सरबजीत सिंह तो नहीं था, हां उनकी यादें जरूर थी। वो यादें जो 24 अप्रैल को इस परिवार ने सरबजीत सिंह के साथ कोट लखपत जेल में बिताई थी। कोट लखपत जेल में एक बहन की अपने भाई से, एक पत्नी की अपने सुहाग से और दो बेटियां की अपने पापा से मुलाकात हुई। एक हफ्ते के लिए ये परिवार पाकिस्तान गया था। वहां सरबजीत से मिलने की इजाजत भी मिल गई। इस परिवार के लिए उस पल को शब्दों में बयां करना असंभव है। जब सरबजीत का परिवार कोट लखपत जेल पहुंचा उनकी दिल की धड़कनें बढ़ गई। कैदी सेल की तरफ बढ़ते उनके कदम कभी तेज हो रहे थे तो कभी ठिठक रहे थे। उनकी दोनों बेटियां(पूनम और स्वप्निल), पत्नी और बहन (दलबीर कौर) के लिए वो पल एक स्वप्न सरीखे था। दूर से ही दलबीर कौर ने अपने भाई को देख लिया। जैसे ये परिवार सरबजीत के पास पहुंचा, आंसूओं का सैलाब उमड़ पड़ा। सरबजीत ने सबसे पहले अपनी बेटी को पहचान लिया। उसके मुंह से पहला शब्द निकला पूनम मेरी बेटी.... और फिर एक बेटी अपने बाप से लिपट गई। लेकिन बाप बेटी के बीच सलाखें थी सो पूनम ठीक से अपने पापा के गले नहीं मिल सकी। आपको बता दें कि सरबजीत सिंह को खुले में नहीं मिलने दिया गया। वो सलाखों के पीछे ही रहा और उसका परिवार सलाखों के बाहर। सरबजीत सिंह काफी देर तक अपनी बेटी के हाथों को सहलाता रहा। इस दौरान सभी भावुक हो गए... गालों पर मोटे मोटे आंसू भरभरा गए। लेकिन तभी सरबजीत सिंह ने अपने आपको संभाला। उसने अपने आंसू रोक लिए। बेटियों को भरोसा दिलाया कि यहां तुम रोने नहीं आए हो।, हिम्मत रखो और मेरे लिए दुआएं करो। और फिर सरबजीत की बहन ने अपने भाई की कलाई पर राखी बांधी। सरबजीत ने कहा, बहन इस घड़ी में मेरे पास तुम्हे देने को कुछ भी नहीं है। इसके बाद सरबजीत ने अपने हाथों से चाय बनाई। उसने अपने परिवार वालों के लिए कोल्ड ड्रिंक मंगवाई थी। इसी दौरान सरबजीत सिंह ने अपनी बहन को बताया कि वो बेकसूर है। उसने कोई जुर्म नहीं कबूला है। सरबजीत सिंह ने एक सनसनीखेज बात बताई, उसने कहा कि कोर्ट में उसकी बेगुनाही लगभग साबित हो चुकी थी, जज उसे बेगुनाह बताने ही वाले थे। तभी पता चला कि उसकी बेगुनाही के सबूत वाली फाइल गायब हो गई है। सरबजीत ने बताया कि आज तक वो फाइल नहीं मिली है। इस दौरान सरबजीत की बहन ने ही ज्यादा बात की। वो ज्यादा समय इधर उधर की बातों में गंवाना नहीं चाहती थी, सो ज्यादातर बातें केस लेकर ही हुई। लेकिन 18 साल बाद की ये मुलाकात महज 48 मिनट में खत्म हो गई। दरअसल मुलाकात के लिए 48 मिनट का ही समय दिया गया था। सरबजीत की बेटियों ने बताया कि जिस समय उसे समय खत्म होने की जानकारी दी गई, आंखें छलछला आई। बेटी अपने पापा के पास ही रुक जाना चाहती थी, कास उसके वश में होता। वो तो ये भी चाहती थी कि अपने पापा को यहां से साथ लेकर ही घर लौटे .... हालांकि उसे 48 मिनट की मुलाकात के बाद इस परिवार ने एक बार फिर मुलाकात की अनुमति मांगी, लेकिन तब तक वीजा की अवधि खत्म हो गई थी।

दो हफ़्ते के लिए टली सरबजीत की फांसी


पाकिस्तानी जेल में बंद सरबजीत सिंह की फांसी दो सप्ताह के लिए टाल दी गई है। ये फैसला 28 अप्रैल 2008 को लिया गया। इससे पहले सरबजीत सिंह को एक अप्रैल को फाँसी दी जानी थी, जिसे एक महीने के लिए बढ़ाया गया। इसके बाद एक मई को फांसी दी जानी थी लेकिन इसे फिर से दो सप्ताह के लिए टाल दिया गया। दरअसल परवेज मुशर्रफ के पास सरबजीत सिंह पर रहम के लिए कई याचिकाएँ भेजी गई थी। इधर पाकिस्तान की नई सरकार ने भी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के पास सरबजीत की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।

गुरुवार, 24 अप्रैल 2008

कैसे जेल पहुंचा सरबजीत ?


सरबजीत सिंह गलती से सीमा पार कर गया था। उन्हीं दिनों 1990 में पाकिस्तान के लाहौर और फैसलाबाद में चार जगहों पर बम धमाके हुए जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई थी। इसी सिलसिले में सरबजीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। वहां सरबजीत सिंह को मनजीत सिंह के नाम से गिरफ्तार किया गया। उन पर जासूसी के आरोप लगे। लाहौर की एक अदालत में मुकदमा चला और 1991 में सरबजीत को मौत को सजा सुनाई गई। निचली अदालत की ये सजा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बहाल रखी। सरबजीत ने सुप्रीम कोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी जिसे 2006 में खारिज कर दिया गया। 06 मार्च 2008 को ये खबर आई कि मुशर्रफ ने सरबजीत की माफी की अपील को खारिज कर दिया। 16 मार्च 2008 को पाकिस्तान के समाचार एजेंसियों के हवाले से खबर आई कि सरबजीत की फांसी तारीख तय हो गई है और उसे 1 अप्रैल को फांसी दे दी जाएगी। ये खबर पाकिस्तान के एक अखबार डेली एक्सप्रेस में समाचार एजेंसी की तरफ से छपी थी। भारत सरकार के प्रयासों से 19 मार्च को ये खबर आई कि 30 अप्रैल तक के लिए सरबजीत की फांसी पर रोक लगा दी गई है। भारत के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में ये बयान दिया कि पाकिस्तान में क़ैद भारतीय बंदी सरबजीत सिंह की फाँसी 30 अप्रैल तक टाल दी गई है। 21 अप्रैल 2008 को पाकिस्तान में मानवाधिकार मामलों के पूर्व मंत्री अंसार बर्नी ने सरबजीत राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के पास एक दया याचिका भेजी है। इस याचिका में अंसार बर्नी ने अपील की है कि सरबजीत की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दी जाए या उन्हें रिहा कर दिया जाए।

एक भावुक मुलाकात

फोटो- साभार बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम
एक बेटी पहली बार अपने पिता से मिली। और एक पत्नी एक अरसे बाद अपने पति से मिल सकी। ये मुलाकात किसी और की नहीं सरबजीत की उसके परिवार वालों के साथ पाकिस्तान के कोट लखपत जेल में हुई। 24 अप्रैल 2008 को सरबजीत का परिवार पंजाब प्रांत पंजाब गृह मंत्रायल के मुख्यालय पहुंचे। वहां सरबजीत के परिजनों ने गृह सचिव नदीम हसन आसिफ से मुलाकात के लिए याचिका दी। गृह मंत्रालय ने तुरंत सरबजीत से मुलाकात की अनुमति दे दी। सरबजीत सिंह की पत्नी सुखप्रीत कौर ने 18 साल बाद अपने पति से मुलाक़ात की। वहीं उन की दोनों बेटियों ने पहली बार अपने पिता को देखा। उस भावुक क्षण को शब्दों में बयां कर पाना असंभव है। मुलाकात के बाद सरबजीत की बहन दलबीर कौर, पत्नी सुखबीर कौर और दोनों बेटियां बाहर निकली तो वहां का नजारा काफी भावुक था। इससे पहले 23 अप्रैल बुधवार को सरबजीत का परिवार बाघा सीमा से पाकिस्तान पहुंचा।
पाकिस्तान सरकार ने सरबजीत सिंह के परिवार को सात दिनों का वीज़ा दिया।

रविवार, 13 अप्रैल 2008

सोने का पिंजरा


ईटीवी में नौकरी करना बड़ा कठिन काम है. बस यूं समझ लीजिए कि आपको जंजीरों से जकड़ कर सोने के पिंजरे में डाल दिया गया है. रामोजी फिल्म सिटी किसी हसीन वादी से कम नहीं है. कई बार इसे एशिया की बेहतरीन फिल्म सिटी का अवार्ड मिल चुका है. सो मैंने इसे सोने का पिंजरा नाम दिया है. जहां आपकी जंजीरें एक निश्चित समय के बाद ही खुलेंगी. ऐसे मौके तो बहुत मिलते हैं कि आप खुद से उन जंजीरों को तोड़ कर बाहर आ जाएं. लेकिन तब आपकी हालत लुटी पिटी सी होती है. जी हां मेरी भी कुछ ऐसी ही है. मेरी ही क्यों ऐसी हिमाकत करने वाले सैकड़ों लोग लुटे पिटे से हैं. इतना कुछ खो जाने के बाद संभलने में काफी समय लगता है. खासकर दिमागी तौर पर आप हमेशा परेशान रहते हैं. मैं कोई पहेली नहीं बुझा रहा. ईटीवी में ट्रेनी से शुरूआत करने वाले मेरी व्यथा समझ गए होंगे. चलिए आपको भी विस्तार से व्यथा की कथा बता ही दूं ....
लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद मेरा सेलेक्शन ईटीवी में हो गया. खुशी हुई कि अब अमर उजाला छो़ड़कर टीवी पत्रकारिता की शुरूआत करुंगा. लेकिन इसके लिए तीन साल का बॉन्ड भरवाया गया. बॉन्ड में साफ साफ लिखा था, एक साल के अंदर अगर आपने नौकरी छोड़ दी तो आपको एक लाख रुपये भरने होंगे. दूसरे साल नौकरी छोड़ने पर 75 हजार रुपये और तीसरे साल नौकरी छोड़ने पर 50 हजार का जुर्माना देना होगा. जब हैदराबाद पहुंचा तो ज्वाइनिंग से पहले सारे ऑरिजनल सर्टिफिकेट जमा करा लिए गए. भारी मन से पांच हजार की नौकरी के लिए सारे ऑरिजनल सर्टिफिकेट जमा करा दिए. काम शुरू कर दिया लेकिन जोर का झटका काफी जोर से लगा. यहां कोई विजुअल एडीटर नहीं था. ट्रेनी से लेकर कॉपी एडिटर तक सभी विजुअल एडीटर थे. एक आदमी एंकर लिखता था वो भी स्ट्रिंगर्स की खबरों में का, के, की और मात्रा की अशुद्धि ठीक कर देने भर से अपनी ड्यूटी पूरी कर लेता था. महज कुछ लोग ऐसे थे जो नए सिरे से एंकर लिखने की जहमत उठाते थे. समझ नहीं पा रहा था कि इस नौकरी का क्या करूं. बॉन्ड इसलिए भरा था कि तीन साल में इलेक्ट्रानिक मीडिया की अच्छी खासी समझ हो जाएगी. लेकिन यहां तो विजुअल एडिटिंग के सिवाय लिखने का काम नाम मात्र का ही था. हालांकि दिन भर मे एक पैकेज लिखने का मौका तो मिल जाता था. लेकिन अफसोस, सीनियरों से दिखाने पर बिनी एक शब्द काटे पैकेज ओके हो जाता था. ऐसा बिल्कुल नहीं था कि मैं बहुत अच्छा लिखता था. ऐसा हर किसी के साथ होता था. यानि आप जो लिखते हैं सभी सही है.
एक साल बाद कॉपी एडिटर का ओहदा मिला. इसे विजुअल एडिटर का नाम दिया जाता तो जस्टीफाइ होता. सबसे बेहतर कॉपी एडिटर वह होता था जो विजुअल में जर्क नहीं भेजता था. कई इफेक्ट के साथ पैकेज बनाता था. कमबख्त समय का मारा मैं भी एक बेहतर कॉपी एडीटर बन गया. कहना जरूरी नहीं कि एक बेहतर विजुअल एडीटर बन गया. डेढ़ साल होते होते समय काटना मुश्किल हो गया. हर किसी का प्रोफेशनल लाइफ बर्बाद हो रहा था क्योंकि कलम की ताकत खत्म हो रही थी. कई तो इसी में खुश थे. और ईटीवी को जर्नलिजम की स्कूल मानने लगे थे. जहां पत्रकारों की उपज होती है. ऐसा शायद ही कोई था जिससे विजुअल एडिटिंग नहीं कराई जाती थी. शायद डेस्क इंचार्ज ऐसा नहीं करते थे. लेकिन ज्यादातर डेस्क इंचार्ज ऐसे थे जो पहले कॉपी एडिटर थे. मतलब साफ है विजुअल एडिटर थे. ईटीवी की एक और खासियत थी. किसी विजुअल में जर्क ऑन एयर हो जाने पर या फिर बाइट में प्री रोल पोस्ट रोल नहीं होने पर कॉपी एडिटर की क्लास लगती थी. ये क्लास कोई और नहीं ईटीवी के सीनियर मैनेजर लेते थे. है न मजे की बात. मैनेजर डेस्क इंचार्ज को कहता था अमुक व्यक्ति ने गलती की है मेरे पास भेजिए.
इन सब चीजों से परेशान हो कई लोग मौका देख नौकरी छोड़ रहे थे. लेकिन सबकी अब तक की जमा पूंजी यानि कि ऑरिजनल सर्टिफिकेट यहीं फंसे रहे. नौकरी छोड़ने पर लीगल नोटिस भेजा जाता था. कई लोगों ने डरकर पैसे दिए और सर्टिफिकेट लेकर चैन की सांस ली. लेकिन अभी भी दर्जनों लोग ऐसे हैं जिनके सर्टिफिकेट सोने के पिंजरे(रामोजी फिल्म सिटी) में बंद है. मैंने भी हिम्मत करके नौकरी छोड़ दी और लाइव इंडिया ज्वाइन कर लिया. लेकिन मुश्किल और भी बढ़ गई है. सारे सर्टिफिकेट वहीं फंसे हैं. रिजाइन देने के बाद लीगल नोटिस भेजा गया कि, आपने बॉन्ड ब्रेक किया है इसिलिए पैसे चुकाएं. बात सिर्फ इतनी नहीं है पीएफ के पैसे भी फंसे हैं. बार बार धमकी भरा पत्र आता है कि आप सेटलमेंट कर लो नहीं तो कोर्ट में घसीटे जाओगे. और लोगों की तरह मैं भी इंतजार में हूं जब कोर्ट में मामला जाएगा तो देखेंगे. लेकिन इस बीच बॉन्ड भरने के दौरान साक्षी बने मेरे एक रिश्तेदार को भी धमकी भरा पत्र मिला कि सारे पैसे उनसे वसूले जाएंगे.

शनिवार, 29 मार्च 2008

खबर की खोज में

जबसे पत्रकार बना हूं... खबर तलाश रहा हूं लेकिन हर रोज मायूसी ही हाथ लगती है... कभी आमिर खान शाहरूख को नंबर दो बोल हंगामा खड़ा कर देते हैं तो कभी राखी सावंत कोई कारनामा कर जाती है.... और फिर न्यूज चैनल्स की खबर बन जाती है... लेकिन क्या ये सचमुच की खबरें हैं.... कभी मेनका गांधी से जबरन पूछा जाता है, सोनिया के अध्यक्ष पद पर दस साल पूरे करने पर आप क्या कहेंगी... मजबूरी में वो कहती है बधाई हो.. खबर बन जाती है... महज दो सेकेंड की बाइट को बार बार दुहराकर दिखाते हैं... सुर्खियां बटोरने के लिए रैंप पर मॉडलों के कपड़े सरक जाते हैं तो हम उसे सैंकड़ों बार दिखाते हैं.... क्या यही सबसे बड़ी खबर है.... मैं परेशान हूं... ये जानने को बेताब हूं कि आखिर खबर क्या है ?