शनिवार, 5 जनवरी 2013

जी न्यूज पर दिल्ली पुलिस के कपड़े उतरे... सरकार का दुपट्टा सरका...


जैसे ही जी न्यूज पर बहादुर दामिनी के उस बहादुर दोस्त ने सच बताना शुरू किया.. दिल्ली पुलिस की चरित्र रूपी कपड़े उतरने लगे.. पहले लगा एक दो कपड़े ही उतरेंगे.. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.. दिल्ली पुलिस नंगी हो गई.. इतना ही नहीं केन्द्र सरकार का दुपट्टा भी सरक गया.. निर्दयी सरकार भी निर्वस्त्र हो गई.. दामिनी और उसका दोस्त 16 दिसंबर की रात सड़क पर पड़े तड़प रहे थे.. लेकिन अब निर्लज्ज दिल्ली पुलिस और बेशर्म सरकार लोगों के बीच नंगा है.. लेकिन इंतहा देखिए दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ता..

जरा पूरी कहानी सुन लीजिए.. दामिनी के दोस्त ने क्या क्या बताया..

दिल्ली पुलिस का पहला कपड़ा ऐसे उतरा..

बस डेढ़ घंटे से ज्यादा समय तक दिल्ली की चमचमाती सड़कों दौड़ती रही.. उसमें गैंगरेप होता रहा.. दरिंदे दामिनी की अंतरियां बाहर निकालते रहे.. दिल्ली पुलिस ने कहा, बस में सिर्फ चालीस मिनट तक तक ये सब हुआ.. झूठी और बेशर्म दिल्ली पुलिस.. डेढ़ घंटे तक काले शीशे वाली बस को नामर्द दिल्ली पुलिस ने क्यों नहीं रोका..

दामिनी के दोस्त ने दूसरा कपड़ा भी उतार दिया—

दिल्ली पुलिस की दो- तीन पीसीआर वैन पहुंची लेकिन.. वो लोग आपस में बात करते रहे कि कौन सी पीसीआर वैन दोनों को उठाकर ले जाएगा... इस दौरान दामिनी के शरीर से खून निकलता रहा.. दोनों कराहते रहे.. आधे घंटे बाद दोनों को उठाया गया.. अब दिल्ली पुलिस की सुनिए.. पुलिस अधिकारी गोगिया ने बताया कि पीसीआर वैन 10.29 बजे पहुंच गई थी.. और 10.39 पर दोनों को उठाया गया.. अरे बेशर्म दिल्ली पुलिस दस मिनट की देरी भी क्यों हुई.. इस दौरान क्या तुम लोग भारत की लहूलुहान बेटी के मरने का इंतजार कर रहे थे.. ये दस मिनट का जवाब क्यों नहीं देते.. तुम्हारे तो दूसरा कपड़ा भी उतर गया.. इस दौरान दोनों पीसीआर में क्या बातें हो रही थी बताओ..

दिल्ली पुलिस का तीसरा कपड़ा ऐसे उतरा

दामिनी के दोस्त ने बताया कि दोनों बीच सड़क पर रात को नंगे बदन ठंड में ठिठुर रहे थे लेकिन किसी ने उनके बदन को ढंकने की कोशिश नहीं की.. काफी देर बाद किसी ने एक चादर को फाड़कर दिया जिसमें दामिनी को लपेटा गया.. दिल्ली पुलिस इस बारे में चुप है..

दिल्ली पुलिस का चौथा कपड़ा ऐसे उतरा

जब दामिनी खून से लथपथ.. सड़क पर पड़ी थी.. उसकी छोटी आंत बाहर निकली थी.. उसका दोस्त जिसके शरीर को रॉड से तोड़ दिया गया था.. जिसका हाथ बड़ी मुश्किल से काम कर रहा था.. जिसके पांव बड़ी मुश्किल से उठ रहे थे.. जिसकी हलक से एक शब्द भी थरथरा कर निकल रहे थे.. उसने अपनी दोस्त यानि दामिनी को उठाकर पीसीआर वैन में बिठाया.. दिल्ली पुलिस ने उठाने की जहमत नहीं उठाई.. सिर्फ इसलिए कि शायद खून से हाथ लाल न हो जाए.. बेशर्म दिल्ली पुलिस ने कहा कि दोनों के पीसीआर वैन के जवानों ने उठाकर वैन में बिठाया.. क्यों उस साहसी लड़की के दोस्त को झूठा करार देने की कोशिश कर रहे हो.. पूरा हिंदुस्तान जानता है कि वो दोस्त झूठ नहीं बोल सकता.. अब उसके पास झूठ बोलने के लिए कुछ नहीं बचा है.. वो हीरो बनने के लिए, पब्लिसिटी के लिए अपना चेहरा दिखाने जी न्यूज पर नहीं आया था.. वो दिल्ली पुलिस की दरिंदगी और शिथिल और जिंदा लाश वाली छवि लोगों के सामने लाने आया था..

दिल्ली पुलिस का पांचवां कपड़ा ऐसे उतरा

दिल्ली पुलिस ने दोनों को सफदरजंग अस्पताल लेकर गए... वहां तुरंत इलाज करवाने की जरूरत नहीं समझी.. डॉक्टर्स से विनती भी नहीं की.. बस सड़क से लाकर अस्पताल में पटक दिया.. जैसे तैसे अपनी छुट्टी छुड़ाई.. ड्यूटी पूरी की.. खैर ये तो दिल्ली पुलिस के लिए रोज की बात है.. उसे क्या पता था कि ये केस इतना हाईलाइट हो जाएगा.. पूरा देश जाग जाएगा.. सफदरजंग अस्पताल में डेढ़ घंटे बाद इलाज शुरू हो पाया.. दोनों जमीन पर पड़े रहे.. दिल्ली पुलिस ने एक कंबल तक दिलवाने की कोशिश नहीं की.. न ही दिल्ली पुलिस ने लड़के से बात कर उसके घर फोन करने की जरूरत समझी..

दिल्ली पुलिस का छठा कपड़ा ऐसे उतरा

जब जेएनयू के छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किया तो थोड़ा दबाव बढ़ा.. सफदरजंग के बाहर प्रदर्शन हो रहे थे.. मीडिया ने भी उस दिन इस खबर को ज्यादा तवज्जो नहीं दी.. वो इसलिए क्योंकि नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे.. लेकिन जब दूसरे दिन मीडिया ने खबर को मुहिम के तौर पर चलाया तो हड़कंप मच गया.. दिल्ली पुलिस के कान खड़े हुए.. छाया शर्मा जैसी बड़ी अधिकारियों ने थोड़ी चुस्ती दिखाई.. बस थोड़ी चुस्ती.. दामिनी के दोस्त को लेकर चार दिनों तक थाने में ही रखा.. और जब कुछ दरिंदे पकडे गए तो लड़के से कहा गया कि देखो मैने कितना अच्छा काम किया.. मेरे घर पर दाल-आटा है या नहीं इसकी चिंता नहीं.. बच्चों से कई दिनों से बात नहीं हुई.. घर का मुंह नहीं देखा.. ये बात सबको बताओ.. ये बताओ कि मैंने कितना अच्छा काम किया.. दिल्ली पुलिस दामिनी के दोस्त के इस सनसनीखेज आरोप पर भी चुप है.. सोचिए क्या दिल्ली पुलिस हर केस में ऐसा करती है.. सिर्फ मामला तूल पकड़ता है तो चुस्ती दिखती है..

दिल्ली पुलिस का सातवां कपड़ा ऐसे उतरा

दिल्ली पुलिस ने अपनी पीठ थपथपाने के चक्कर में मानवता की हदें पार कर दी.. दामिनी के दोस्त का इलाज तक नहीं कराया.. उसके पूरे बदन पर चोट थे.. पांव की हथियां कूच दी गई थी.. लेकिन उसे चार दिन थाने में बिठाकर रखा.. उसका इलाज नहीं किया.. आरोपियों को पकड़ने के लिए उसे बिठाया ये तो ठीक.. लेकिन  इलाज क्यों नहीं किया.. इस पर भी दिल्ली पुलिस के पास कोई ठोस जवाब नहीं है..

यानि दिल्ली पुलिस के सारे कपड़े उतर गए.. अब देश की जनता के हाथ में है कि इसका क्या करें...

अब सुनिये सरकार का दुपट्टा कैसे सरका ?

गैंगरेप के दूसरे दिन जब शीला से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर से पूछो.. बाह री शीला सरकार, शायद शीला दीक्षित सोच रही थी कि दिल्ली में गैंगरेप कोई नया मामला तो है नहीं.. बाकी मामलों की तरह ही दब जाएगा.. लेकिन दबाव बढ़ता गया और उसी हिसब से सरकार ने कदम उठाने शुरू किए.. प्रदर्शन बढ़ा तो गृह मंत्रालय जागा.. इलाज में भी धीरे-धीरे तेजी लाई गई..लोगों का मूड भांपकर काम किया गया.. लोगों का प्रदर्शन रोकने के लिए लाठी बरसाई गई.. सुशील शिंदे ने कहा कि जब सारे आरोपी पकड़े गए तो फिर शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी क्यों.. अरे शिंदे साहब, दिल्ली पुलिस की नाकामी का जिम्मेदार कौन है.. काले शीशे और बिना परमिट वाली बस चलने के लिए कौन जिम्मेदार है.. इलाज के लिए पहले सिंगापुर क्यों नहीं ले जाया गया.. शायद डॉक्टर्स ने कह दिया था कि अब दामिनी नहीं बचेगी तो अपनी छवि सुधारने के लिए सिंगापुर भेजा गया.. जबकि सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल में छोटी आंत के ट्रांसप्लांट का एक भी केस सफलता पूर्वक पूरा नहीं हुआ.. इस सच को जानकर भी दामिनी को सिंगापुर क्यों ले जाया गया.. इस सच से सरकार की दुपट्टा सरक गया.. दामिनी के इलाज का दिखावा करने वाली दिल्ली पुलिस ने दामिनी के दोस्त का इलाज नहीं करवाया.. आज वो खुद के पैसों पर प्राइवेट अस्पताल में इलाज करवा रहा है.. अगर इलाज में थोड़ी और देरी हो जाती तो शायद वो हमेशा के लिए अपंग रह जाता.. दिल्ली सरकार का कोई भी मंत्री उस लड़के से नहीं मिला.. उसका हाल नहीं जाना.. सिर्फ इसलिए क्योंकि मीडिया में काफी दिनों तक उस लड़के की चर्चा नहीं हुई..  

दिल्ली सरकार ने दामिनी का बयान लेने के लिए एसडीएम को भेजा.. दामिनी ने अपनी जान पर खेलकर.. ऑक्सीजन मास्क निकालकर बयान दर्ज करवाया.. दामिनी का दोस्त भी उस वक्त मौजूद था.. वो लगातार उल्टी कर रही थी.. फिर भी बयान दे रही थी.. उसने दरिंदगी की एक- एक कहानी बताई.. दूसरे दिन एसडीएम ने कहा कि बयान ठीक से दर्ज नहीं हुआ.. ये किसी के दबाव में दिलवाया गया था.. ये समझ से परे है कि ऐसा क्यों किया गया.. क्या दिल्ली सरकार आरोपियों को बचाना चाहती है..

दिल्ली पुलिस, केन्द्र सरकार, शीला सरकार सब जनता की कटघरे में है.. दिल्ली पुलिस नंगी खड़ी है तो.. केन्द्र और दिल्ली सरकार का भी दुपट्टा सरका हुआ है.. लोगों को ऐसी पुलिस और ऐसी सरकार के खिलाफ फैसला करना ही चाहिए.. उठो..जागो.. और हिसाब कर दो.. इनके गुनाहों का.. ताकि कोई ऐसा गुनहगार पैदा न हो जो हिंदुस्तान की बेटी को छू भी पाए..

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

दामिनी को दिल्ली पुलिस ने मारा ?

आज गैंगरेप पीड़ित दामिनी के लिए पूरा देश रो रहा है.. हर घर में लोग शोक मना रहे हैं.. चौक-चौराहों पर सिर्फ दामिनी की चर्चा है.. लेकिन एक सवाल जो इन सबके बीच दब गया है.. वो ये कि दामिनी को किसने मारा ? इस सवाल का जवाब ढूंढे उससे पहले दामिनी को श्रद्धांजलि.. हम उस साहसी लड़की के शोक संतप्त परिवार के साथ हैं.. साथ ही हमारी सहानुभूति देश के व्यवस्था की नाकामी से दरिंदों के शिकार हुए हर दामिनी के साथ है..
फिर वही सवाल की दामिनी को किसने मारा? दामिनी को दिल्ली पुलिस ने मारा.. दामिनी को सोनिया-मनमोहन सरकार ने मारा.. दामिनी को शीला सरकार ने मारा.. दामिनी मरी नहीं मार दी गई है.. दिल्ली पुलिस को जिस काम में लगाया गया है वो काम नहीं कर पा रही है.. दिल्ली पुलिस दिल्ली के लोगों को सुरक्षा नहीं दे पा रही है.. बहन बेटियों की इज्जत यहां महफूज नहीं है.. ये दिल्ली पुलिस दरिंदों की साथी है.. चोर-बदमाशों उच्चकों की शुभचिंतक है.. इमानदार दिल्लीवालों के लिए ये दिल्ली पुलिस नहीं है.. और इस दिल्ली पुलिस की इस दशा के लिए सोनिया-मनमोहन की केन्द्र सरकार जिम्मेदार है.. दामिनी क मौत के बाद उसके मां-बाप को भले ही आर्थिक मदद मिल जाए लेकिन इससे क्या उसकी बेटी वापस आ जाएगी.. एक भाई को उसकी बहन मिल जाएगी.. क्या एक मां का अपनी बेटी को ससुराल विदा करने का सपना पूरा हो पाएगा.. समय आ  गया है जब दिल्ली पुलिस कमिश्नर को बर्खास्त कर पूरी पुलिसिया व्यवस्था की ओवरमेकिंग की जाए.. पुलिस को ये बताया जाए कि अंग्रेजों का जमाना गया जब हक के लिए आवाज उठाने वालों पर डंडे बरसाए जाते थे.. जब पुलिस का मतलब सिर्फ पुलिस का डर नहीं होना चाहिए.. सिर्फ बदमाशों को पुलिस से डरना चाहिए.. लेकिन होता क्या है.. कभी किसी गरीब लड़की से रेप होता है या बदतमीजी होती है तो जरा पुलिस स्टेशन का हाल देखिए.. पुलिस डरा धमका कर केस दर्ज करने से मना कर देती है.. दामिनी का मामला भी दब जाता अगर लोग सड़कों पर नहीं आते.. अगर मीडिया इस कदर मुहिम न चला रहा होता.. याद कीजिए गैंगरेप के दूसरे दिन शीला दीक्षित से गैंगरेप पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने पुलिस कमिश्नर की तरफ इशारा कर बोला इनसे पूछिए मैं क्यों बोलूं.. वाह री महिला मुख्यमंत्री.. आपको जरा भी शर्म न आई.. जरा भी लज्जा न आई... उस पीड़ित के लिए दो शब्द कहने को आपके पास शब्द नहीं थे.. जब मामला तूल पकड़ने लगा तो शीला के बोल ही बदल गए.. लगा एक भी वोट कम न हो जाए.. तो लगी गृह मंत्रालय को कोसने.. दिखाने लगी झूठ-मूठ की हमदर्दी.. नेताओं का घिनौना चेहरा सामने आया.. बेशर्म गृह मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि जब हमने प्रदर्शनकारियों की सारी मांगे मान ली तो फिर शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी क्यों किया जाए.. अरे बेशर्म शिंदे जी आपने कौन सी मांगें मान ली.. आपकी बेटी से गैंगरेप होता तो क्या आज वो दरिंदे जिंदा होते.. अब जरा प्रधानमंत्री की बात जान लीजिए.. प्रधानमंत्री जी ने देश को संबोधित किया.. भाषण के अंत में बोल गए ठीक है.. ऐसा लगा जैसे देश को बेवकूफ बनाकर सोनिया को कह रहे हों कि ठीक है मैंने तो लोगों को मूर्ख बना दिया.. वो भाषण टीवी चैनलों पर बिना एडिट के दिखाया गया.. अब सोनिया जी का हाल सुन लीजिए.. महिला होने के बाद भी लड़की से तब तक कोई हमदर्दी नहीं दिखी जब तक कि लोगों ने प्रदर्शन नहीं किया.. वाह री इटली की गोरी मैम.. हिंदुस्तान की बेटी से रेप हुआ तुम्हें क्या.. अब देखिए राष्ट्रपति जी के बेटे का हाल.. उन्होंने बयान दे दिया कि रात को डिस्को जाने वाली लड़कियां प्रदर्शन कर रही हैं.. ये प्रदर्शन तो फैशन बन गया है.. अरे महाशय आपकी बहन से रेप हुआ होता तो पता चलता प्रदर्शनकारी फैशन कर रहे हैं या ये वाजिब गुस्सा है.. दामिनी को अपना बहन मान लो दर्द पता चल जाएगा... इस पूरे प्रकरण में राष्ट्रपति महोदय की चुप्पी भी समझ  से परे रहा.. वो महामहिम हैं इसलिए उन पर ज्यादा सवाल नहीं उठा सकता.. वैसे भी राष्ट्रपति महोदय तो अपने मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करते हैं.. ये संविधान कहता है.. वैसे राष्ट्रपति महोदय को आगे आकर एक अध्यादेश तो लाना ही चाहिए था.. ऐसे दरिंदों को मौत देने वाला अध्यादेश लेकिन ये भी नहीं हुआ.. अब तो प्रदर्शन पर भी रोक है.. दस दस मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए हैं.. अरे तुम्हारे बाप से पैसे से बना है क्या मेट्रो.. जो जब मन में आए बंद कर देते हो.. अरे शर्म करो देश को लूटने वाले नेताओं ये सोचो की तुम्हारी बेटी के साथ गैंगरेप हुआ है.. तभी तुम इस देश की जनता के हित की बात सोचोगे.. वर्ना न्यूज चैनलों का क्या.. आज दिखा रहा है.. प्रदर्शन खत्म होते ही खबर बदल जाएगी.. सिर्फ दामिनी के दरिंदों को सजा दिलाने से कुछ नहीं होगा.. ऐसी व्यवस्था करो... सुरक्षा के ऐसे इंतजाम करो कि देश की एक भी बेटी दामिनी न बन सके..

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

क्या असीम का 'देशद्रोह' वाकई देशद्रोह है?

अंग्रेजों ने भारत पर हुकुमत कायम रखने के लिए और देशभक्तों को काबू में रखने के लिए देशद्रोह कानून बनाया था। उस वक्त इसे सैडीशन लॉ कहा गया, यानि देशद्रोह का कानून। लेकिन आजादी के बाद भारतीय संविधान में उसे अपना लिया गया। भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 124 A के मुताबिक अगर कोई भी व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन भी करता है तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सज़ा हो सकती है। ब्रिटेन ने ये कानून अपने संविधान से हटा दिया है, लेकिन भारत के संविधान में ये कानून आज भी मौजूद है। आखिर क्यों? मेरे हिसाब से तो गोले अंग्रेज चले गए लेकिन काले अंग्रेज जमे हुए हैं।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

अन्ना के साथ साजिश !


अन्ना के साथ साजिश रची गई है, गहरी साजिश। अनशन की अनुमति मिली लेकिन जेपी पार्क में सिर्फ तीन दिनों की अनुमति मिली है। केन्द्र सरकार हर वो काम कर रहे हैं जिससे अन्ना के अनशन को रोका जा सके। अब तीन दिन के लिए जेपी पार्क की अनुमति का क्या मतलब है? इसके बाद वो क्या करेंगे? क्या अब इस देश में शांतिपूर्ण विरोध की भी आजादी नहीं है। हमारे वोट से चुनकर संसद में पहुंचे लोग अचानक इतने शक्तिशाली कैसे हो गए कि उन्हें हमारा डर भी नहीं ? बात किसी पार्टी विशेष की नहीं है। कांग्रेस जाएगी तो बीजेपी आएगी। सब तो एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। हमारे पास विकल्प क्या है? हम जनलोकपाल बिल की मांग कर रहे हैं लेकिन भ्रष्टाचारियों की फौज(नेता) राजी ही नहीं हैं। अब अन्ना को अपनी मांग रखने से भी साजिश के तहत रोक रहे हैं।

मंगलवार, 29 मार्च 2011

चक्रव्यूह में फंस गया देश


रोम जल रहा था, नीरो बंशी बजा रहा था। आज भी हालात ऐसे ही हैं। देश में घोटालों की बाढ़ आ गई है, सरकार काला धन वापस लाने को तैयार नहीं। गरीबी, बेरोजगारी से देश का दम निकल रहा है, लेकिन सरकार क्रिकेट के पीछे पागल है। समझ नहीं आ रहा एक खेल को इतनी तवज्जो क्यों ? बिहार में तो विधानसभा का सत्र आधे समय तक ही चलाने का फैसला लिया गया है ताकि विधायकों, मंत्रियों को मैच देखने में कोई दिक्कत न हो। हमारी मानसिकता को क्या हो गया। मुंबई पुलिस वानखेड़े में खेले जाने वाले फाइनल मुकाबले वाले दिन आम अवकाश घोषित करवाने की गुहार लगा रही है। क्या ये खेल का विकृत रूप नहीं है। प्रधानमंत्री मैच देखेंगे, सोनिया जी मैच देखेंगी, पाकिस्तान को न्योता भेजा गया है। हिंदी चैनलों में क्रिकेट के अलावा कोई खबर ही नहीं है। देश के गरीबों की भूख क्रिकेट से ही मिटेगी ! देश के बीमारों का इलाज क्रिकेट से ही होगा ! क्या पाकिस्तान पर जीत से आतंकियों का खात्मा हो जाएगा! कश्मीर समस्या का समाधान हो जाएगा! सड़क पर चाय की दुकान से लेकर फाइव स्टार होटल तक में क्रिकेट का बुखार चढ़ा है। असली मुद्दों से भटकाने के लिए सरकार भी मैच को खूब प्रमोट कर रही है। आम लोगों का दर्द कोई देखने वाला नहीं है। लोगों के दिमाग को इस कदर तैयार कर दिया गया है कि दर्द से तड़पता मरीज भी दवा के बदले मैच का स्कोर पूछ बैठे। धन्य हैं हम... धन्य है हमार सरकार।

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

न्यूज रूम में छल !


मॉर्निंग शिफ्ट के लोग घर जाने की तैयारी में थे। 4 बजे की बुलेटिन शुरू होने में कुछ मिनट ही बचे थे। तभी Executive Producer राकेश त्रिपाठी और राजेन्द्र प्रसाद मिश्रा जी(आरपीएम) मीटिंग से सीधे न्यूज रूम में आए। उनके साथ बाबा रामदेव भी थे। दोनों मिलकर उन्हें न्यूजरूम से रूबरू करवा रहे थे। एकाएक बाबा रामदेव को देख सभी अचंभित थे। आम तौर पर किसी के आने से पहले उनकी चर्चा होती है लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। राकेश जी न्यूज रूम के लोगों से बाबा रामदेव को मिलवा रहे थे। राकेश जी ने जोश में आवाज लगाई अमर जल्दी आओ.... बाबा रामदेव को देख अमर जी दौड़ पड़े... बाबा के सामने हाथ जोड़े भाव विभोर मुद्रा में खड़े थे.. तभी आरपीएम जी बोल पड़े, बाबा ये अमर आनंद हैं लाइव इंडिया के सबसे होनहार प्रोड्यूसर। अमर जी इतने भाव विभोर थे कि उनके मुंह में शब्द जैसे अटक गए थे... एकाएक उनको ख्याल आया और बोल पड़े राकेश भैया बाबा जी के साथ एक फोटो प्लीज... फिर क्या था फोटो खींचने का सिलसिला शुरू हो गया। असिस्टेंट प्रोड्यूसर शंभू जो आम तौर पर साधु संतों को गरियाते नजर आते हैं, बाबा रामदेव के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। कुछ देर में बाबा रामदेव न्यूज रूम से चले गए लेकिन चर्चा सिर्फ उन्हीं की हो रही थी। अमर जी जिस सीट पर बैठते हैं उसके ठीक पीछे एसी है, लेकिन बाबा रामदेव से मिलने के बाद वो पसीने से तरबतर थे। अमर जी बोले जा रहे थे, राकेश भैया का आभारी हूं उन्होंने बाबा रामदेव के सामने मेरा नाम लेकर पुकारा और मिलवाया। अमर जी इतने आह्लादित थे कि बुलेटिन की चिंता भी नहीं रही। आगे बोले, इसी तरह से मैं एक बार राष्ट्रपति से भी मिला था। मैंने पूछा, बाबा को एकाएक देखकर कैसा लगा। अमर जी बोल पड़े-- एकदम से कन्फूजिया गया, कुछ समझ में नहीं आया। दूसरी तरफ शंभू मुझसे मोबाइल से फोटो भेजने को कह रहा था। साथ ही अपनी सफाई भी दे रहा था कि वो सिर्फ बाबा रामदेव की ही इज्जत करते हैं। शंभू ने कहा कि वो ये फोटो अपने गांव में सबको दिखाएगा। वहीं न्यूज रूम में कुछ लोग बाबा रामदेव से मिलकर खुश हो रहे लोगों को देख मंद मंद मुस्करा रहे थे। ये मुस्कुराहट रहस्यमयी थी। कुछ देर में ये रहस्यमयी मुस्कुराहत ठहाकों में बदल गई। ऐसे लगा जैसे बम फूटा- किसी ने कहा ये तो नकली बाबा रामदेव थे। अमर जी जैसे नींद से जागे, उनके चेहरे का पसीना सूख गया। शंभू बोला धत तेरी के बेकूफ बना दिया। नकली बाबा से मिलने वाले बाकी लोगों का भी कुछ ऐसा ही हाल था।

मौत पर भोज पार्ट-3


हरिद्वार से दिल्ली पहुंचे और दूसरे दिन सुबह सीमांचल एक्सप्रेस से पूर्णियां रवाना हो गए। सारे लोग साथ थे, दो सीट दूसरी बॉगी में थी। दुखी तो हम सारे ही थे, आफत हम सब पर टूटी थी लेकिन पापा तो जैसे टूट ही गए थे। वो दूसरी बॉगी में अकेले ही रहना चाहते थे। काफी मनाने के बाद वो दूसरे पैसेंजर से सीट एक्सचेंज करने को राजी हुए। दूसरे दिन हमलोग गांव पहुंचे वहां पहले से ही समाज के लोग इकट्ठा थे। मेरी 100 साल की दादी पर नजर पड़ते ही पापा फूट-फूट कर रोने लगे। घर की एक एक दीवार में मां बसी थी। हर हवा के झोंके मां की याद दिला रहे थे। हम सब फूट-फूट कर रोने लगे। परिवार समाज के लोग इस घड़ी में अपना कर्तव्य निभाते हुए सांत्वना दे रहे थे। लेकिन दुख उस वक्त हुआ जब किसी ने खाने तक को नहीं पूछा। रात हुई तो समाज के लोग अपने घर चले गए। एक तो मां का गम ऊपर से लंबी दूरी से आने के बाद की थकान। पापा समाज की प्रवृति से वाकिफ से उन्होंने घर पहुंचने से पहले हमें बता दिया था कि घर में चावल-दाल तो है लेकिन सब्जियां बाजार से खरीद लो। उम्मीद मत करना कि रात को कोई खाने को भी पूछेगा। गांव के लोगों में अब उतनी आत्मीयता नहीं रही। घर परिवार के लोग भी अब पहले जैसे नहीं रहे। खाने का मन तो नहीं था लेकिन जिंदा रहने के लिए मन को कठोर करना पड़ा। खुद से खाना बनाया और थोड़ा-थोड़ा खाकर सो गए। दूसरे दिन सुबह से ही सांत्वना देने वालों के आने का सिलसिला जारी रहा। फिर सतलहन से एक दिन पहले गांव के लोगों की मीटिंग हुई। हर मौत के बाद ये बैठक होती थी। इस बैठक में क्रिया- कर्म और भोज भात के बारे में चर्चा का प्रचलन है। बुजुर्गों ने मां की आत्मा की शांति के लिए लंबी लिस्ट बना दी। क्रिया कर्म की लिस्ट देख दिमाग चकरा गया। इसके बाद भोज का खर्चा अलग से। बैठक में ये तय हुआ कि कुल खर्च 2 लाख रुपये के करीब आएगा। महंगाई भी बढ़ गई है। भोज का सिलसिला तो सतलहन से ही शुरू हो गया। हालांकि उस सिर्फ अपने टोले के लोगों को ही खिलाने का प्रचलन है। ब्रह्मण तब तक नहीं खाएंगे जब तक कि हम सब शुद्ध नहीं हो जाते। ब्रह्मण तो हमारे घर की चाय भी नहीं पीते। घर में गरूड़ पुराण का पाठ नियमित रूप से चल रहा था। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि कैसे आप अपने पाप से छुटकारा पा सकते हैं। धरती पर किए पाप की सजा यमराज के दूत देते हैं। हजारों तरह के नर्क होते हैं और हर इंसान के पाप के मुताबिक नर्क का द्वार खुलता है। मृतक आत्मा को ज्यादा कष्ट न हो इसके लिए दान का वर्णन है। गरूड़ पुराण के मुताबिक दान देने लगते तो हमारे परिवार में भुखमरी की नौबत आ जाती है। जमाना कहां से कहां चला गया है लेकिन पंडित गरूड़ पुराण पढ़कर बताते हैं कि अगर आपका पति स्वर्गवासी हो गया है तो आपको सति हो जाना चाहिए। सती होने का तरीका भी बताया गया है। पति की चिता के ऊपर किस तरह बैठना है ये भी बताया गया है। गरूड़ पुराण में लिखा है कि ब्रह्मणों के घर मौत होने पर नखवाल 10वें दिन हो। यानि कि ब्रह्मण जाति के लोग जल्दी शुद्ध होंगे। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इतनी जल्दी शुद्ध नहीं होंगे। जब मैंने अपने पंडित से पूछा कि हमलोग 10 दिन में शुद्ध क्यों नहीं हो सकते तो उनका कहना था कि कलयुग में धर्म की हानी हुई है इसलिए आपलोग भी अब नियम बदलकर 10 दिनों में नखबाल कर सकते हैं। कहीं न कहीं कहने का मतलब ये था कि हम लोग अधर्मी हो गए हैं इसलिए 10 में करने की बात कर रहे हैं। हम तीनों भाई भोज-भात के पक्ष में नहीं थे। एक तो मां की मौत ऊपर से 2 लाख रुपये का खर्च। पंडितों ने इतना डरा दिया है कि अभी भी लोग इस परंपरा से हटने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। जब पापा से बात की तो वो रोने लगे बोले कि मां की आत्मा को शांति कैसे मिलेगी। समाज के कुछ लोगों ने तो हर कर दी जो दो दिन पहले मौत पर सांत्वना दे रहे थे वही अब बेहतर हलवाई मंगाने की बात कर रहे थे। एक सज्जन जो रिश्ते में मेरे चाचा लगते हैं पापा को कह रहे थे कि इलाके में इज्जत का सवाल है पांच-छह तरह की मिठाई तो जरूर रखना। मेरी एक न चली। मामा मुझे समझा रहे थे, कुछ मत बोलो नहीं तो पापा को कष्ट होगा। मैंने बैठकी में भी भोज-भात का विरोध किया लेकिन कोई फायदा नहीं...। दिल मसोस कर सारी तैयारी में शामिल होता रहा। सतलहन के बाद नखबाल के दिन भी भोज हुआ। एकादशा और द्वादशा के भोज के लिए हलवाई 10 हजार के मेहनताना पर माना। क्रिया-कर्म और भोज में करीब 2 लाख रुपये खर्च हो गए। बावजूद इसके कुछ लोगों को सब्जी में नमक ज्यादा और कम होने की शिकायत होती रही। हद तो तब हो गई जब लोगों को खाना खिलाने वाले गांव के युवकों की टोली ने दारू की मांग की। बेहयाई भरी मांग को भी पूरी करनी पड़ी। इस मांग में मेरे परिवार के लोग भी शामिल थे। बातें बहुत हैं और क्या क्या लिखूं।