मंगलवार, 9 मार्च 2010

हिजड़ा मतलब गुंडा !


रात के 12 बजे ऑफिस से घर के लिए निकला। लक्ष्मी नगर में साईं के भक्त भंडारा कर रहे थे। लोगों की लंबी लाइन लगी थी। विश्वास नहीं हो रहा था कि रात के साढ़े 12 बजे महिला पुरूष भंडारे का लुत्फ उठाएंगे। मैं भी भंडारे के लिए लाइन में लग गया। भंडारे में लाइन की व्यवस्था ठीक रहे इसके लिए कई साईं भक्त देखभाल कर रहे थे। तभी दो हिजड़े लाइन में न लगकर सीधे भंडारे के पास पहुंचने लगे। कार्यकर्ताओं ने रोकने की कोशिश तो हिजड़े गुस्से में अपनी अदा दिखाने लगे। हिजड़े चीखने लगे... मुझे रोकने की कोशिश कर रहे हो... मुझसे बदतमीजी कर रहे हो... मुझे जानते नहीं तुम लोगों को देख लूंगा। लेकिन साईं भक्त भी मानने वाले नहीं ... जय साईं, जय साईं कहते हुए हिजड़ों को आगे जाने से रोक दिया। आखिरकार गाली गलौज करते हुए हिजड़े वहां से निकल लिए। मैं इस वाकये का गवाह था... सोचने लगा आखिर हिजड़े दादागीरी पर क्यों उतर आते हैं? भंडारे में खाया और घर आकर सो गया। सुबह नींद खुली तो घर की घंटी बजी। देखा एक हिजड़ा खड़ा था। कह रहा था/रही थी घर में बच्चा हुआ है पैसे निकालो। मैंने कहा भई बच्चा हुआ तो तुम्हें पैसे क्यों दूं। हिजड़ा- तुम्हारे बच्चे की उम्र लंबी होगी। मैंने कहा- उसकी उम्र यूं ही लंबी हो जाएगी तुम चिंता न करो। खैर मेरी मां ने 100 रुपए का नोट निकालकर दिया। हिजड़ा तैश में आ गया – ये क्या दे रहे हो... साढ़े सात हजार दो, 5 हजार या फिर कम से कम ढाई हजार रुपए दो। मैंने कहा- मम्मी इसे कुछ भी मत दो। हिजड़े ने गुस्से में कहा- भूत प्रेत लगे तो पीछा छोड़ देता है, हिजड़े पीछा नहीं छोड़ते... देखना पैसे लेकर रहूंगा। मैं भी पैसा नहीं देने पर अड़ गया। मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए ज्यादा बहस करना उचित नहीं समझा। हिजड़ा यहां भी दादागीरी से पैसे वसूल करना चाहता था। हिजड़े ने कहा, दिल्ली में रहना है तो पैसे तो देने ही होंगे। मैंने 100 नंबर डायल कर दिया। पुलिस के फोन लगाते देख हिजड़े ने तैश में कहा कि मैं अपने बाकी साथियों को बुलाता हूं.... उस वक्त हिजड़े 5-6 की टोली में थे। वे मेरी फ्लैट से नीचे उतरा लेकिन फिर लौटा नहीं। कुछ देर बात पुलिस भी आ गई लेकिन तब तक हिजड़े जा चुके थे। पुलिसवालों ने कहा हिजड़े फिर आए तो फोन कर देना। सुबह सुबह मूड खराब हो गया। आस परोड़ वाले मुझे ही कोस रहे थे, उनका कहना था कि हिजड़े को हजार दो हजार दे देते तो क्या होता उनकी बददुआ लेना ठीक नहीं।

रविवार, 7 मार्च 2010

वो क्यूं चला गया?.


शादी के 18 साल और बड़ी मन्नतों के बाद एक बेटा हुआ। बेटे के बाद तो भगवान ने झोलियां भर दी एक के बाद एक तीन बेटियों से घर भर गया। अब तक सास की तानों से परेशान थी अब भगवान ने सबकुछ दे दिया। बस थोड़ा कचोट तो होगा ही कि भगवान ने बेटा एक ही दिया... काश! तीन बेटियों में से एक बेटा होता????? घर में भेदभाव की नींव भी पड़ गई। बेटियों से लगाव न हो ऐसी बात नहीं थी। तीनों के लालन पालन में कोई कमी भी नहीं हुई लेकिन बेटा तो बेटा ही था। घर का अकेला चिराग वो भी शादी के 18 साल बाद जो आया था। बेटे को ज्यादा तवज्जो और बेटियों को थोड़ा कम। बेटे की पढ़ाई महंगे कॉन्वेंट स्कूल में बेटियों की पढ़ाई दिल्ली के सरकारी स्कूलों में। बेटे को लाड़ प्यार ने बिगाड़ दिया मन आसमान छूने लगा। बड़े घर के बेटों के बीच पढ़ाई करके खुद को भी करोड़पति समझने लगा था। बेटियां हमेशा कायदे में रही घर के हालात के मुताबिक बिल्कुल फिट। बेटे ने सपना देखा.... सपनों में छलांग लगाई... आसमान में उड़ता रहा। बेटा घर के हालात से बेफिक्र रहा या फिर मां-बाप ने हालत समझने ही नहीं दिया। नौंवी क्लास तक आते आते बेटे की इच्छाओं पर कुठाराघात होने लगा। शायद करोड़पति दोस्तों जैसी सुविधा नहीं मिली, हालांकि मां बाप के प्यार में कोई कमी नहीं रही, लेकिन उसके मन मष्तिष्क का आधार करोड़पति बच्चों जैसा बन गया था। इच्छाएं पूरी नहीं हुई तो सर्किल भी खराब हो गया। पढ़ाई से मन उचटने लगा। किसी तरह दसवीं पास की और आगे न पढ़ने की जैसे कसम ही खा ली। उसे तो बस इतनी पढ़ाई में ही अमीर बनना था। किसी तरह बारहवीं की पढ़ाई भी पूरी हो गई। बात रोजगार की आई तो कॉल सेंटर में नौकरी कर ली। कॉल सेंटर की नौकरी से भी मन उचट गया। उसका मन कहीं नहीं लगता था... वो शराब भी पीने लगा था। घरवाले परेशान रहते कि आखिर ये चाहता क्या है... इसकी इच्छाएं क्या हैं? उसे जितना समझने की कोशिश की गई घरवाले उतने ही कन्फ्यूज होते गए। या तो वो घरवालों को नहीं समझ पा रहा था या फिर घरवाले उसे नहीं समझ पा रहे थे। घर के मुखिया इनकमटैक्स की नौकरी से रिटायर्ड हो गए। घर के मुखिया ने छोटा मोटा रोजगार भी शुरू कर दिया और इकलौटे बेटे को उसमें शामिल कर लिया। करोड़पति बनने के ख्वाब देखने वाला इकलौता अपने काम से खुश नहीं था। वो जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा कमाना चाहता था। उसके महंगे शौक थे। घरवालों ने ये सोचकर शादी करवा दी कि शायद उसकी जिंदगी एक ढर्रे पर आ जाए। शादी के बाद भी एकलौते बेटे का मन शांत नहीं हुआ, पता नहीं उसे अब भी किस चीज की तलाश थी। इतनी कम उम्र में हार्ट की बीमारी भी हो गई। टेंट का बिजनेस पूरी लगन के साथ करता था लेकिन मन की इच्छाओं को कभी शांत नहीं कर पाया। वो अंदर ही अंदर सपने बुनता रहा और सपने को मरते हुए देखता रहा। अब उसका कोई दोस्त नहीं था जिसके सामने दिल की बात कहता। पत्नी से भी कुछ नहीं कहता था। हर घर की तरह अपने घर में भी सास-बहू के बीच होने वाली हल्की नोंक झोंक से भी थोड़ा परेशान रहता था। 7 फरवरी 2010 की रात... हर रात की तरह वो करीब 12 बजे घर लौटा। हल्की शराब भी पी रखी थी। बेवजह पत्नी को डांट दिया... पत्नी ड्राईंग रूम में सोने चली गई। रात के 2 बजे जब कमरे में लौटी तो घर के इकलौते चिराग का शरीर ठंडा पड़ा था। घरवाले जाग गए... अस्पताल ले जाया गया ... जहां इमरजेंसी में ईसीजी मशीन की रिपोर्ट में एक लंबी सीधी लाइन के सिवा कुछ नहीं आया ... भरे पूरे परिवार का इकलौता चिराग अब नहीं था। हार्ट अटैक, ब्रेन हैमरेज या फिर आत्महत्या ... रहस्य बरकरार है ... पुलिस की तफ्तीश जारी है ...(एक सच्ची घटना पर आधारित)(लोगों का नाम देना उचित नहीं समझा)