मंगलवार, 29 अप्रैल 2008

वो 48 मिनट


सरबजीत का परिवार एक हफ्ते बाद वाघा सीमा से भारत वापस आ गया। कुछ खुशी के तो कुछ गम के आंसू लिए ये वतन लौटे। इनके साथ सरबजीत सिंह तो नहीं था, हां उनकी यादें जरूर थी। वो यादें जो 24 अप्रैल को इस परिवार ने सरबजीत सिंह के साथ कोट लखपत जेल में बिताई थी। कोट लखपत जेल में एक बहन की अपने भाई से, एक पत्नी की अपने सुहाग से और दो बेटियां की अपने पापा से मुलाकात हुई। एक हफ्ते के लिए ये परिवार पाकिस्तान गया था। वहां सरबजीत से मिलने की इजाजत भी मिल गई। इस परिवार के लिए उस पल को शब्दों में बयां करना असंभव है। जब सरबजीत का परिवार कोट लखपत जेल पहुंचा उनकी दिल की धड़कनें बढ़ गई। कैदी सेल की तरफ बढ़ते उनके कदम कभी तेज हो रहे थे तो कभी ठिठक रहे थे। उनकी दोनों बेटियां(पूनम और स्वप्निल), पत्नी और बहन (दलबीर कौर) के लिए वो पल एक स्वप्न सरीखे था। दूर से ही दलबीर कौर ने अपने भाई को देख लिया। जैसे ये परिवार सरबजीत के पास पहुंचा, आंसूओं का सैलाब उमड़ पड़ा। सरबजीत ने सबसे पहले अपनी बेटी को पहचान लिया। उसके मुंह से पहला शब्द निकला पूनम मेरी बेटी.... और फिर एक बेटी अपने बाप से लिपट गई। लेकिन बाप बेटी के बीच सलाखें थी सो पूनम ठीक से अपने पापा के गले नहीं मिल सकी। आपको बता दें कि सरबजीत सिंह को खुले में नहीं मिलने दिया गया। वो सलाखों के पीछे ही रहा और उसका परिवार सलाखों के बाहर। सरबजीत सिंह काफी देर तक अपनी बेटी के हाथों को सहलाता रहा। इस दौरान सभी भावुक हो गए... गालों पर मोटे मोटे आंसू भरभरा गए। लेकिन तभी सरबजीत सिंह ने अपने आपको संभाला। उसने अपने आंसू रोक लिए। बेटियों को भरोसा दिलाया कि यहां तुम रोने नहीं आए हो।, हिम्मत रखो और मेरे लिए दुआएं करो। और फिर सरबजीत की बहन ने अपने भाई की कलाई पर राखी बांधी। सरबजीत ने कहा, बहन इस घड़ी में मेरे पास तुम्हे देने को कुछ भी नहीं है। इसके बाद सरबजीत ने अपने हाथों से चाय बनाई। उसने अपने परिवार वालों के लिए कोल्ड ड्रिंक मंगवाई थी। इसी दौरान सरबजीत सिंह ने अपनी बहन को बताया कि वो बेकसूर है। उसने कोई जुर्म नहीं कबूला है। सरबजीत सिंह ने एक सनसनीखेज बात बताई, उसने कहा कि कोर्ट में उसकी बेगुनाही लगभग साबित हो चुकी थी, जज उसे बेगुनाह बताने ही वाले थे। तभी पता चला कि उसकी बेगुनाही के सबूत वाली फाइल गायब हो गई है। सरबजीत ने बताया कि आज तक वो फाइल नहीं मिली है। इस दौरान सरबजीत की बहन ने ही ज्यादा बात की। वो ज्यादा समय इधर उधर की बातों में गंवाना नहीं चाहती थी, सो ज्यादातर बातें केस लेकर ही हुई। लेकिन 18 साल बाद की ये मुलाकात महज 48 मिनट में खत्म हो गई। दरअसल मुलाकात के लिए 48 मिनट का ही समय दिया गया था। सरबजीत की बेटियों ने बताया कि जिस समय उसे समय खत्म होने की जानकारी दी गई, आंखें छलछला आई। बेटी अपने पापा के पास ही रुक जाना चाहती थी, कास उसके वश में होता। वो तो ये भी चाहती थी कि अपने पापा को यहां से साथ लेकर ही घर लौटे .... हालांकि उसे 48 मिनट की मुलाकात के बाद इस परिवार ने एक बार फिर मुलाकात की अनुमति मांगी, लेकिन तब तक वीजा की अवधि खत्म हो गई थी।

दो हफ़्ते के लिए टली सरबजीत की फांसी


पाकिस्तानी जेल में बंद सरबजीत सिंह की फांसी दो सप्ताह के लिए टाल दी गई है। ये फैसला 28 अप्रैल 2008 को लिया गया। इससे पहले सरबजीत सिंह को एक अप्रैल को फाँसी दी जानी थी, जिसे एक महीने के लिए बढ़ाया गया। इसके बाद एक मई को फांसी दी जानी थी लेकिन इसे फिर से दो सप्ताह के लिए टाल दिया गया। दरअसल परवेज मुशर्रफ के पास सरबजीत सिंह पर रहम के लिए कई याचिकाएँ भेजी गई थी। इधर पाकिस्तान की नई सरकार ने भी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के पास सरबजीत की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।

गुरुवार, 24 अप्रैल 2008

कैसे जेल पहुंचा सरबजीत ?


सरबजीत सिंह गलती से सीमा पार कर गया था। उन्हीं दिनों 1990 में पाकिस्तान के लाहौर और फैसलाबाद में चार जगहों पर बम धमाके हुए जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई थी। इसी सिलसिले में सरबजीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। वहां सरबजीत सिंह को मनजीत सिंह के नाम से गिरफ्तार किया गया। उन पर जासूसी के आरोप लगे। लाहौर की एक अदालत में मुकदमा चला और 1991 में सरबजीत को मौत को सजा सुनाई गई। निचली अदालत की ये सजा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बहाल रखी। सरबजीत ने सुप्रीम कोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी जिसे 2006 में खारिज कर दिया गया। 06 मार्च 2008 को ये खबर आई कि मुशर्रफ ने सरबजीत की माफी की अपील को खारिज कर दिया। 16 मार्च 2008 को पाकिस्तान के समाचार एजेंसियों के हवाले से खबर आई कि सरबजीत की फांसी तारीख तय हो गई है और उसे 1 अप्रैल को फांसी दे दी जाएगी। ये खबर पाकिस्तान के एक अखबार डेली एक्सप्रेस में समाचार एजेंसी की तरफ से छपी थी। भारत सरकार के प्रयासों से 19 मार्च को ये खबर आई कि 30 अप्रैल तक के लिए सरबजीत की फांसी पर रोक लगा दी गई है। भारत के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में ये बयान दिया कि पाकिस्तान में क़ैद भारतीय बंदी सरबजीत सिंह की फाँसी 30 अप्रैल तक टाल दी गई है। 21 अप्रैल 2008 को पाकिस्तान में मानवाधिकार मामलों के पूर्व मंत्री अंसार बर्नी ने सरबजीत राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के पास एक दया याचिका भेजी है। इस याचिका में अंसार बर्नी ने अपील की है कि सरबजीत की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दी जाए या उन्हें रिहा कर दिया जाए।

एक भावुक मुलाकात

फोटो- साभार बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम
एक बेटी पहली बार अपने पिता से मिली। और एक पत्नी एक अरसे बाद अपने पति से मिल सकी। ये मुलाकात किसी और की नहीं सरबजीत की उसके परिवार वालों के साथ पाकिस्तान के कोट लखपत जेल में हुई। 24 अप्रैल 2008 को सरबजीत का परिवार पंजाब प्रांत पंजाब गृह मंत्रायल के मुख्यालय पहुंचे। वहां सरबजीत के परिजनों ने गृह सचिव नदीम हसन आसिफ से मुलाकात के लिए याचिका दी। गृह मंत्रालय ने तुरंत सरबजीत से मुलाकात की अनुमति दे दी। सरबजीत सिंह की पत्नी सुखप्रीत कौर ने 18 साल बाद अपने पति से मुलाक़ात की। वहीं उन की दोनों बेटियों ने पहली बार अपने पिता को देखा। उस भावुक क्षण को शब्दों में बयां कर पाना असंभव है। मुलाकात के बाद सरबजीत की बहन दलबीर कौर, पत्नी सुखबीर कौर और दोनों बेटियां बाहर निकली तो वहां का नजारा काफी भावुक था। इससे पहले 23 अप्रैल बुधवार को सरबजीत का परिवार बाघा सीमा से पाकिस्तान पहुंचा।
पाकिस्तान सरकार ने सरबजीत सिंह के परिवार को सात दिनों का वीज़ा दिया।

रविवार, 13 अप्रैल 2008

सोने का पिंजरा


ईटीवी में नौकरी करना बड़ा कठिन काम है. बस यूं समझ लीजिए कि आपको जंजीरों से जकड़ कर सोने के पिंजरे में डाल दिया गया है. रामोजी फिल्म सिटी किसी हसीन वादी से कम नहीं है. कई बार इसे एशिया की बेहतरीन फिल्म सिटी का अवार्ड मिल चुका है. सो मैंने इसे सोने का पिंजरा नाम दिया है. जहां आपकी जंजीरें एक निश्चित समय के बाद ही खुलेंगी. ऐसे मौके तो बहुत मिलते हैं कि आप खुद से उन जंजीरों को तोड़ कर बाहर आ जाएं. लेकिन तब आपकी हालत लुटी पिटी सी होती है. जी हां मेरी भी कुछ ऐसी ही है. मेरी ही क्यों ऐसी हिमाकत करने वाले सैकड़ों लोग लुटे पिटे से हैं. इतना कुछ खो जाने के बाद संभलने में काफी समय लगता है. खासकर दिमागी तौर पर आप हमेशा परेशान रहते हैं. मैं कोई पहेली नहीं बुझा रहा. ईटीवी में ट्रेनी से शुरूआत करने वाले मेरी व्यथा समझ गए होंगे. चलिए आपको भी विस्तार से व्यथा की कथा बता ही दूं ....
लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद मेरा सेलेक्शन ईटीवी में हो गया. खुशी हुई कि अब अमर उजाला छो़ड़कर टीवी पत्रकारिता की शुरूआत करुंगा. लेकिन इसके लिए तीन साल का बॉन्ड भरवाया गया. बॉन्ड में साफ साफ लिखा था, एक साल के अंदर अगर आपने नौकरी छोड़ दी तो आपको एक लाख रुपये भरने होंगे. दूसरे साल नौकरी छोड़ने पर 75 हजार रुपये और तीसरे साल नौकरी छोड़ने पर 50 हजार का जुर्माना देना होगा. जब हैदराबाद पहुंचा तो ज्वाइनिंग से पहले सारे ऑरिजनल सर्टिफिकेट जमा करा लिए गए. भारी मन से पांच हजार की नौकरी के लिए सारे ऑरिजनल सर्टिफिकेट जमा करा दिए. काम शुरू कर दिया लेकिन जोर का झटका काफी जोर से लगा. यहां कोई विजुअल एडीटर नहीं था. ट्रेनी से लेकर कॉपी एडिटर तक सभी विजुअल एडीटर थे. एक आदमी एंकर लिखता था वो भी स्ट्रिंगर्स की खबरों में का, के, की और मात्रा की अशुद्धि ठीक कर देने भर से अपनी ड्यूटी पूरी कर लेता था. महज कुछ लोग ऐसे थे जो नए सिरे से एंकर लिखने की जहमत उठाते थे. समझ नहीं पा रहा था कि इस नौकरी का क्या करूं. बॉन्ड इसलिए भरा था कि तीन साल में इलेक्ट्रानिक मीडिया की अच्छी खासी समझ हो जाएगी. लेकिन यहां तो विजुअल एडिटिंग के सिवाय लिखने का काम नाम मात्र का ही था. हालांकि दिन भर मे एक पैकेज लिखने का मौका तो मिल जाता था. लेकिन अफसोस, सीनियरों से दिखाने पर बिनी एक शब्द काटे पैकेज ओके हो जाता था. ऐसा बिल्कुल नहीं था कि मैं बहुत अच्छा लिखता था. ऐसा हर किसी के साथ होता था. यानि आप जो लिखते हैं सभी सही है.
एक साल बाद कॉपी एडिटर का ओहदा मिला. इसे विजुअल एडिटर का नाम दिया जाता तो जस्टीफाइ होता. सबसे बेहतर कॉपी एडिटर वह होता था जो विजुअल में जर्क नहीं भेजता था. कई इफेक्ट के साथ पैकेज बनाता था. कमबख्त समय का मारा मैं भी एक बेहतर कॉपी एडीटर बन गया. कहना जरूरी नहीं कि एक बेहतर विजुअल एडीटर बन गया. डेढ़ साल होते होते समय काटना मुश्किल हो गया. हर किसी का प्रोफेशनल लाइफ बर्बाद हो रहा था क्योंकि कलम की ताकत खत्म हो रही थी. कई तो इसी में खुश थे. और ईटीवी को जर्नलिजम की स्कूल मानने लगे थे. जहां पत्रकारों की उपज होती है. ऐसा शायद ही कोई था जिससे विजुअल एडिटिंग नहीं कराई जाती थी. शायद डेस्क इंचार्ज ऐसा नहीं करते थे. लेकिन ज्यादातर डेस्क इंचार्ज ऐसे थे जो पहले कॉपी एडिटर थे. मतलब साफ है विजुअल एडिटर थे. ईटीवी की एक और खासियत थी. किसी विजुअल में जर्क ऑन एयर हो जाने पर या फिर बाइट में प्री रोल पोस्ट रोल नहीं होने पर कॉपी एडिटर की क्लास लगती थी. ये क्लास कोई और नहीं ईटीवी के सीनियर मैनेजर लेते थे. है न मजे की बात. मैनेजर डेस्क इंचार्ज को कहता था अमुक व्यक्ति ने गलती की है मेरे पास भेजिए.
इन सब चीजों से परेशान हो कई लोग मौका देख नौकरी छोड़ रहे थे. लेकिन सबकी अब तक की जमा पूंजी यानि कि ऑरिजनल सर्टिफिकेट यहीं फंसे रहे. नौकरी छोड़ने पर लीगल नोटिस भेजा जाता था. कई लोगों ने डरकर पैसे दिए और सर्टिफिकेट लेकर चैन की सांस ली. लेकिन अभी भी दर्जनों लोग ऐसे हैं जिनके सर्टिफिकेट सोने के पिंजरे(रामोजी फिल्म सिटी) में बंद है. मैंने भी हिम्मत करके नौकरी छोड़ दी और लाइव इंडिया ज्वाइन कर लिया. लेकिन मुश्किल और भी बढ़ गई है. सारे सर्टिफिकेट वहीं फंसे हैं. रिजाइन देने के बाद लीगल नोटिस भेजा गया कि, आपने बॉन्ड ब्रेक किया है इसिलिए पैसे चुकाएं. बात सिर्फ इतनी नहीं है पीएफ के पैसे भी फंसे हैं. बार बार धमकी भरा पत्र आता है कि आप सेटलमेंट कर लो नहीं तो कोर्ट में घसीटे जाओगे. और लोगों की तरह मैं भी इंतजार में हूं जब कोर्ट में मामला जाएगा तो देखेंगे. लेकिन इस बीच बॉन्ड भरने के दौरान साक्षी बने मेरे एक रिश्तेदार को भी धमकी भरा पत्र मिला कि सारे पैसे उनसे वसूले जाएंगे.