शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

दामिनी को दिल्ली पुलिस ने मारा ?

आज गैंगरेप पीड़ित दामिनी के लिए पूरा देश रो रहा है.. हर घर में लोग शोक मना रहे हैं.. चौक-चौराहों पर सिर्फ दामिनी की चर्चा है.. लेकिन एक सवाल जो इन सबके बीच दब गया है.. वो ये कि दामिनी को किसने मारा ? इस सवाल का जवाब ढूंढे उससे पहले दामिनी को श्रद्धांजलि.. हम उस साहसी लड़की के शोक संतप्त परिवार के साथ हैं.. साथ ही हमारी सहानुभूति देश के व्यवस्था की नाकामी से दरिंदों के शिकार हुए हर दामिनी के साथ है..
फिर वही सवाल की दामिनी को किसने मारा? दामिनी को दिल्ली पुलिस ने मारा.. दामिनी को सोनिया-मनमोहन सरकार ने मारा.. दामिनी को शीला सरकार ने मारा.. दामिनी मरी नहीं मार दी गई है.. दिल्ली पुलिस को जिस काम में लगाया गया है वो काम नहीं कर पा रही है.. दिल्ली पुलिस दिल्ली के लोगों को सुरक्षा नहीं दे पा रही है.. बहन बेटियों की इज्जत यहां महफूज नहीं है.. ये दिल्ली पुलिस दरिंदों की साथी है.. चोर-बदमाशों उच्चकों की शुभचिंतक है.. इमानदार दिल्लीवालों के लिए ये दिल्ली पुलिस नहीं है.. और इस दिल्ली पुलिस की इस दशा के लिए सोनिया-मनमोहन की केन्द्र सरकार जिम्मेदार है.. दामिनी क मौत के बाद उसके मां-बाप को भले ही आर्थिक मदद मिल जाए लेकिन इससे क्या उसकी बेटी वापस आ जाएगी.. एक भाई को उसकी बहन मिल जाएगी.. क्या एक मां का अपनी बेटी को ससुराल विदा करने का सपना पूरा हो पाएगा.. समय आ  गया है जब दिल्ली पुलिस कमिश्नर को बर्खास्त कर पूरी पुलिसिया व्यवस्था की ओवरमेकिंग की जाए.. पुलिस को ये बताया जाए कि अंग्रेजों का जमाना गया जब हक के लिए आवाज उठाने वालों पर डंडे बरसाए जाते थे.. जब पुलिस का मतलब सिर्फ पुलिस का डर नहीं होना चाहिए.. सिर्फ बदमाशों को पुलिस से डरना चाहिए.. लेकिन होता क्या है.. कभी किसी गरीब लड़की से रेप होता है या बदतमीजी होती है तो जरा पुलिस स्टेशन का हाल देखिए.. पुलिस डरा धमका कर केस दर्ज करने से मना कर देती है.. दामिनी का मामला भी दब जाता अगर लोग सड़कों पर नहीं आते.. अगर मीडिया इस कदर मुहिम न चला रहा होता.. याद कीजिए गैंगरेप के दूसरे दिन शीला दीक्षित से गैंगरेप पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने पुलिस कमिश्नर की तरफ इशारा कर बोला इनसे पूछिए मैं क्यों बोलूं.. वाह री महिला मुख्यमंत्री.. आपको जरा भी शर्म न आई.. जरा भी लज्जा न आई... उस पीड़ित के लिए दो शब्द कहने को आपके पास शब्द नहीं थे.. जब मामला तूल पकड़ने लगा तो शीला के बोल ही बदल गए.. लगा एक भी वोट कम न हो जाए.. तो लगी गृह मंत्रालय को कोसने.. दिखाने लगी झूठ-मूठ की हमदर्दी.. नेताओं का घिनौना चेहरा सामने आया.. बेशर्म गृह मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि जब हमने प्रदर्शनकारियों की सारी मांगे मान ली तो फिर शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी क्यों किया जाए.. अरे बेशर्म शिंदे जी आपने कौन सी मांगें मान ली.. आपकी बेटी से गैंगरेप होता तो क्या आज वो दरिंदे जिंदा होते.. अब जरा प्रधानमंत्री की बात जान लीजिए.. प्रधानमंत्री जी ने देश को संबोधित किया.. भाषण के अंत में बोल गए ठीक है.. ऐसा लगा जैसे देश को बेवकूफ बनाकर सोनिया को कह रहे हों कि ठीक है मैंने तो लोगों को मूर्ख बना दिया.. वो भाषण टीवी चैनलों पर बिना एडिट के दिखाया गया.. अब सोनिया जी का हाल सुन लीजिए.. महिला होने के बाद भी लड़की से तब तक कोई हमदर्दी नहीं दिखी जब तक कि लोगों ने प्रदर्शन नहीं किया.. वाह री इटली की गोरी मैम.. हिंदुस्तान की बेटी से रेप हुआ तुम्हें क्या.. अब देखिए राष्ट्रपति जी के बेटे का हाल.. उन्होंने बयान दे दिया कि रात को डिस्को जाने वाली लड़कियां प्रदर्शन कर रही हैं.. ये प्रदर्शन तो फैशन बन गया है.. अरे महाशय आपकी बहन से रेप हुआ होता तो पता चलता प्रदर्शनकारी फैशन कर रहे हैं या ये वाजिब गुस्सा है.. दामिनी को अपना बहन मान लो दर्द पता चल जाएगा... इस पूरे प्रकरण में राष्ट्रपति महोदय की चुप्पी भी समझ  से परे रहा.. वो महामहिम हैं इसलिए उन पर ज्यादा सवाल नहीं उठा सकता.. वैसे भी राष्ट्रपति महोदय तो अपने मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करते हैं.. ये संविधान कहता है.. वैसे राष्ट्रपति महोदय को आगे आकर एक अध्यादेश तो लाना ही चाहिए था.. ऐसे दरिंदों को मौत देने वाला अध्यादेश लेकिन ये भी नहीं हुआ.. अब तो प्रदर्शन पर भी रोक है.. दस दस मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए हैं.. अरे तुम्हारे बाप से पैसे से बना है क्या मेट्रो.. जो जब मन में आए बंद कर देते हो.. अरे शर्म करो देश को लूटने वाले नेताओं ये सोचो की तुम्हारी बेटी के साथ गैंगरेप हुआ है.. तभी तुम इस देश की जनता के हित की बात सोचोगे.. वर्ना न्यूज चैनलों का क्या.. आज दिखा रहा है.. प्रदर्शन खत्म होते ही खबर बदल जाएगी.. सिर्फ दामिनी के दरिंदों को सजा दिलाने से कुछ नहीं होगा.. ऐसी व्यवस्था करो... सुरक्षा के ऐसे इंतजाम करो कि देश की एक भी बेटी दामिनी न बन सके..

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

क्या असीम का 'देशद्रोह' वाकई देशद्रोह है?

अंग्रेजों ने भारत पर हुकुमत कायम रखने के लिए और देशभक्तों को काबू में रखने के लिए देशद्रोह कानून बनाया था। उस वक्त इसे सैडीशन लॉ कहा गया, यानि देशद्रोह का कानून। लेकिन आजादी के बाद भारतीय संविधान में उसे अपना लिया गया। भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 124 A के मुताबिक अगर कोई भी व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन भी करता है तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सज़ा हो सकती है। ब्रिटेन ने ये कानून अपने संविधान से हटा दिया है, लेकिन भारत के संविधान में ये कानून आज भी मौजूद है। आखिर क्यों? मेरे हिसाब से तो गोले अंग्रेज चले गए लेकिन काले अंग्रेज जमे हुए हैं।