सरबजीत का परिवार एक हफ्ते बाद वाघा सीमा से भारत वापस आ गया। कुछ खुशी के तो कुछ गम के आंसू लिए ये वतन लौटे। इनके साथ सरबजीत सिंह तो नहीं था, हां उनकी यादें जरूर थी। वो यादें जो 24 अप्रैल को इस परिवार ने सरबजीत सिंह के साथ कोट लखपत जेल में बिताई थी। कोट लखपत जेल में एक बहन की अपने भाई से, एक पत्नी की अपने सुहाग से और दो बेटियां की अपने पापा से मुलाकात हुई। एक हफ्ते के लिए ये परिवार पाकिस्तान गया था। वहां सरबजीत से मिलने की इजाजत भी मिल गई। इस परिवार के लिए उस पल को शब्दों में बयां करना असंभव है। जब सरबजीत का परिवार कोट लखपत जेल पहुंचा उनकी दिल की धड़कनें बढ़ गई। कैदी सेल की तरफ बढ़ते उनके कदम कभी तेज हो रहे थे तो कभी ठिठक रहे थे। उनकी दोनों बेटियां(पूनम और स्वप्निल), पत्नी और बहन (दलबीर कौर) के लिए वो पल एक स्वप्न सरीखे था। दूर से ही दलबीर कौर ने अपने भाई को देख लिया। जैसे ये परिवार सरबजीत के पास पहुंचा, आंसूओं का सैलाब उमड़ पड़ा। सरबजीत ने सबसे पहले अपनी बेटी को पहचान लिया। उसके मुंह से पहला शब्द निकला पूनम मेरी बेटी.... और फिर एक बेटी अपने बाप से लिपट गई। लेकिन बाप बेटी के बीच सलाखें थ...
डिबिया की रोशनी में लाखों घर रौशन होते हैं... डिबिया को जलने दें...