बुधवार, 11 नवंबर 2009

किसके बाप की है ट्रेन ?


लालू जी रेल मंत्री नहीं रहे तो क्या हुआ, ये ट्रेन अपना ही तो है। कहीं भी वेक्यूम कर दो। ट्यूबलाइट, बल्ब खोल लो। आखिर सरकारी संपत्ति जो है। अपना हिस्सा तो लेकर रहेंगे। पटना के पास सटे बख्तियारपुर के उपद्रवी सैंकड़ों लोगों से यात्रियों से भरी ट्रेन को पहले तो रोक दिया फिर इंजन खोलकर ले उड़े। रेलवे ने लॉ एंड ऑर्डर का मामला सरकार के अधीन कहकर पल्ला झाड़ लिया। दानापुर- टाटा एक्सप्रेस के यात्री बेबस और लाचार हो गए। उपद्रवी ट्रेन को बपौती संपत्ति समझ छह किलोमीटर दूर तक ले गए। इंजन को पटरी से नहीं उतार पाए नहीं तो अपने घर ले जाते। एक तरफ तो इमानदार दरोगा के ट्रांसफर का विरोध कर जागरूकता का परिचय दिया। वहीं दूसरी तरफ नेशनल हाईवे पर जाम लगाकर और ट्रेन रोककर मूर्खता और बर्बरता का परिचय दिया। आखिर किसने दिया इन्हें ये अधिकार ? 6 किलोमीटर तक इंजन ले जाने के वक्त पुलिस कहां थी। सबको पता है अगर पुलिस चाहती तो 2 मिनट में उपद्रवियों को सबक सिखा देती। क्या इंजन लेकर भागने वाले अनपढ़ गंवार थे? भैया होंगे भी क्यों नहीं जब पढ़ाने वाले ज्यादातर शिक्षामित्र ही लुच्चे लफंगे हैं तो सीख भी तो वैसी ही देंगे। उपद्रवियों में ज्यादातर 8 साल से 16 साल के बीच के बच्चे शामिल थे। नीतीश जी संभल जाइये नहीं तो किसी दिन आपको भी उठाकर ले जाएंगे ...

3 टिप्‍पणियां:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

हर डाल पे उल्लू बैठा है , डाल-डाल पे उल्लू बैठा है
फिर सोच लो ये दुनिया वालो, अंजामे गुलिस्ताँ क्या होगा ?

Suresh Chiplunkar ने कहा…

यह "लालू संस्कृति" है… और लगभग यही संस्कृति महाराष्ट्र में "राज संस्कृति" के रूप में भी परिलक्षित हो रही है… दोनों ही मामलों में "देश" के बारे में सोचने को कोई भी तैयार नहीं है और कांग्रेस हमेशा की तरह फ़िल्म नायक के अमरीश पुरी के रोल में है…

Mired Mirage ने कहा…

अब तो यह सब पढ़कर आश्चर्य भी नहीं होता। जो न हो वह कम है।
घुघूती बासूती