रविवार, 8 जून 2008

गुर्जर बनाम वसुंधरा


दो कदम गुर्जर चले तो दो कदम राजस्थान सरकार चली। लेकिन ये क्या ये कदम निश्छल और नापाक हैं? खैर इन सवालों के जवाब आने में अभी वक्त लगेंगे, इंतजार कीजिए। सोमवार यानि 9 जून को दो पक्ष आपस में मिलेंगे। दोनों पक्ष एक दूसरे को शंकित नजरों से देखता रहा है, इसमें भी कोई दो राय नहीं। जहां गुर्जरों का कहना है कि वोट पाने के लिए बीजेपी ने उनसे वायदा किया था और वोट मिलने के बाद वायदे से मुकर गई। वहीं राजस्थान सरकार के अपने तर्क हैं। सरकार ने चोपड़ा समिति बनाकर मुद्दे को टालने की कोशिश की थी। लेकिन गुर्जर अड़ गए तो वसुंधरा राजे ने केंन्द्र को चिट्ठी लिखकर गुर्जरों को डिनोटिफाइड श्रेणी यानि घूमंतू जाति के तहत तीन से चार फीसदी आरक्षण देने की मांग की। लेकिन केन्द्र ने भी गेंद फिर से वसुंधरा के पाले में डाल दिया। केन्द्र सरकार का कहना था कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से अलग श्रेणी में आरक्षण का प्रावधान करने का अधिकार राज्यों को है, और राज्य खुद ही ऐसा कर सकता है। केन्द्र के पलटवार के बाद वसुंधरा सरकार के माथे पर बल पड़ गए। गुर्जरों को शांत करने के लिए वार्ता का प्रस्ताव रखा, लेकिन गुर्जर आरक्षण की मांग पर अड़े हैं। ऐसे में सोमवार की बैठक में शायद ही कोई बीच का रास्ता निकल पाए। गुर्जर नेता उन जिंदगियों का हिसाब मांगेंगे जो आरक्षण की मांग के दौरान पुलिस की गोलियों का शिकार बने। अगर गुर्जर नेता झुक गए तो आम गुर्जरों की भावना आहत होगी। उन्हें लगेगा कि नेता राजनीति कर रहे हैं। वहीं सरकार गुर्जरों को अनुसूचित श्रेणी में डालकर मीणाओं को नाराज करने से परहेज करेगी। लेकिन चुनाव को देखते हुए गुर्जरों को नाराज करना भी सरकार के बूते की बात नहीं।

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