सुबाना पर कविता लिखने के काफी दिनों तक मैं सोचता रहा कि आखिर उस बच्ची का क्या हुआ। कहीं से कोई खबर नहीं मिल रही थी। आखिरकार जयपुर में मैंने एक दोस्त को फोन किया तो जो खबरें आई वो विचलित करने वाली थी। जयपुर विस्फोट के महज चार दिन बाद ही सुबाना भी अपनी मां के पास चली गई। जयपुर विस्फोट में सुबाना की मौसी और मां की मौत हो गई थी। सुबाना को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन काल पर किसी का वश नहीं होता। वो मासूम बच्ची जिंदगी की जंग हार गई। अब नहीं रही सुबाना। शर्म करो दहशतगर्दों, फूल सी बच्ची ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो उसकी निश्छल जिंदगी बर्बाद कर दी। पहले तो बच्ची से उसकी ममता का आंचल छीन लिया और उसे इतना गहरा जख्म दिया कि वो भी नहीं रही। शर्म करो आतंकवाद........
मीरा कुमार का स्पीकर चुना जाना खुशी की बात है। लेकिन लोकसभा में जिस तरीके से नेताओं ने मीरा कुमार को धन्यवाद दिया वह कई सवाल खड़े करती है। एक एक कर सभी प्रमुख सांसद सच्चाई से भटकते नजर आए। लगभग सभी ने अपने धन्यवाद प्रस्ताव में कहा कि आज एक दलित की बेटी लोकसभा की स्पीकर बनीं हैं। ये भारतीय लोकतंत्र के लिए गर्व की बात है। बात गर्व की जरूर है। लेकिन असली सवाल ये है कि मीरा कुमार दलित कैसे हैं ? क्या सिर्फ जाति के आधार पर किसी को दलित कहना करना जायज है। क्या सिर्फ इतना कहना काफी नहीं था कि एक महिला लोकसभा स्पीकर बनीं हैं। बात उस समय की करते हैं जब बाबू जगजीवन राम जिंदा थे। उन्हें दलितों के बीच काम करनेवाले प्रमुख नेताओं में गिना जाता है। लेकिन एक सच ये भी है कि जगजीवन राम ‘दलितों के बीच ब्रह्मण और ब्रह्मणों के बीच दलित थे”। हालांकि उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। आज के संदर्भ में दलित शब्द की नई परिभाषा गढ़नी होगी। सिर्फ कास्ट को ध्यान में रखकर दलित की परिभाषा नहीं गढ़ी जा सकती है इसके लिए क्लास को भी ध्यान में रखना ही होगा। उन लोगों को कैसे दलित कहा जा सकता है जो फाइव स्टार लाइफस्ट...
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