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गंदे पत्रकार, गंदी पत्रकारिता

इस हमाम में सब नंगे हैं। पत्रकारों की जमात में नंगों की कमी नहीं है। जब भारत गुलाम था, पत्रकार सच्चे थे। वो भारत को आजादी दिलाने के लिए लिखते थे। आजादी मिल गई तो पत्रकारों का चरित्र बदलने लगा। छोटे से बड़े सभी पत्रकार कमाने के फेर में लग गए। पत्रकारिता एक व्यवसाय के रूप में उभरने लगा तो गंदगी बढ़ने लगी। स्ट्रिंगर से लेकर रिपोर्टर और संपादक तक नंगे होने लगे। हालांकि कुछ पत्रकार अब भी इमानदार बने रहे लेकिन इनकी संख्या न के बराबर ही रही। पत्रकारों को बेईमान बनने के पीछे कई कारण रहे हैं। स्ट्रिंगर और छोटे रिपोर्टर इसलिए दलाल बन गए हैं कि क्योंकि उनकी सैलरी बहुत ही कम होती है। इसमें मीडिया संस्थानों की महती भूमिका होती है। सभी टीवी चैनल या अखबार मालिकों को पता है कि स्ट्रिंगर के परिवार का पेट महज 2 हजार या 3 हजार रूपये महीना की सैलरी में भरने वाला नहीं है। स्ट्रिंगर तो गांव और ब्लॉक स्तर पर जमकर दलाली करते हैं। वहां इनका बड़ा रूतवा होता है। स्ट्रिंगर पत्रकारिता से ज्यादा दलाली और पंचायत करने में अपना बड़प्पन समझते हैं। थानों में दरोगाजी के सामने ऐसे पत्रकारों की बड़ी इज्जत होती है। इतना ही नहीं मीडिया संस्थान इन स्ट्रिंगरों से ही अपना विज्ञापन भी मंगवाते हैं। विज्ञापन के खेल में भी इन स्ट्रिंगरों की कमाई हो जाती है। ये तो रही स्ट्रिंगरों की बात। पत्रकारों की ये बीमारी श्रृखलाबद्ध तरीके से ऊपर तक फैली है। स्ट्रिंगर सौ दो सौ या कुछ हजार लेकर खुश रहते हैं लेकिन जैसे जैसे इससे ऊपर बढ़ेंगे दलाली का रेट भी बढ़ता जाता है। जिला स्तर के स्ट्रिंगर गांव वाले स्ट्रिंगर से ज्यादा कमाते हैं। कुछ तो शहर में ही अपना केबल टीवी चैनल खोल लेते हैं। जिला स्तर के भ्रष्ट अधिकारियों से मिलकर खूब कमाई करते हैं। ये राज्य स्तर के पत्रकारों में बीमारी का स्तर अलग होता है जाहिर है ये प्रदेश की राजधानी में डेरा जमाए रहते हैं जहां विधायक और मंत्रियों की चलती है। बात जब दिल्ली तक पहुंचती है तो पत्रकारों की दलाली अपने चरम पर पहुंच जाती है। अब तक आदर्श पत्रकारों के तौर पर मशहूर वीर सांघवी, बरखा दत्त की भी पोल खुल गई है। अब वो चाहे कितनी भी सफाई दे दें लोगों के दिलोदिमाग में सच घर कर चुका है। भले ही इन दल्ला पत्रकारों पर संस्थान कोई कार्रवाई न करें, इन्हें कोर्ट के भी चक्कर न लगाना पड़े लेकिन सच तो सच है। दुनिया जान चुकी है कि बरखा दत्त, प्रभु चावला, वीर सांघवी जैसे नामी पत्रकार जो इमानदारी और भष्ट्राचार को खत्म करने की बड़ी बड़ी बातें करते हैं दरअसल वो बकवास से ज्यादा कुछ नहीं है।

टिप्पणियाँ

जब नींव ही गलत रखी हो तो इकारत सही कैसे बनेगी?
kaushal ने कहा…
बिल्कुल सही कहा परमजीत जी, टीवी चैनलों और अखबारों के ज्यादातर बड़े पत्रकार(संपादक लेवल) अपने आप को किसी हिटलर से कम नहीं समझते। खासकर टीवी चैनलों की नींव तो जैसे भ्रष्टाचार की ईंट पर रखी गई है।
Swarajya karun ने कहा…
हकीकत बयानी के लिए बधाई .
बड़े साहस का काम कर रहे हो कौशल जी ! मीडिया वाले होकर मीडिया की आलोचना ! बधाई हो ! यह आपकी सजगता और इमानदारी का प्रबल प्रमाण है ....देश को इमानदार मीडिया की सख्त ज़रुरत है.

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